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ICMR पर सवाल:अब कोरोना हुआ तो करीबियों की जांच नहीं होगी, जानिए कैसे इस फैसले से वायरस फैलाने वाले बन जाएंगे हम

4 महीने पहले
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यह एक्सप्लेनर पढ़ने या इसका वीडियो देखने से पहले हम आपको एक किस्सा सुनाते हैं। तो हुआ यूं कि दिल्ली के सबसे घने इलाके यानी चांदनी चौक में रहने वाले एक शख्स को तीन दिन से बुखार था। खांसी और थकावट भी थी। हालत बहुत खराब तो नहीं थी, लेकिन वह पिछले दिनों ही मुंबई से लौटा था। सो घर वालों के कहने पर उसने सरकारी अस्पताल में RT-PCR टेस्ट कराया, तो वह कोरोना पॉजिटिव निकला।

यह काल्पनिक किस्सा 11 जनवरी 2022 का है। अगर यह मामला 10 जनवरी से पहले होता तो इस शख्स के बुजुर्ग माता-पिता, पत्नी और उसके 10 और 13 साल के दो बच्चों की भी कोरोना जांच होती। मगर अब इनकी कोरोना जांच नहीं होगी। भले ही इस शख्स की वजह से ये सभी कोरोना का शिकार हो गए हों।

बस यही है, ICMR की नई गाइडलाइन। जो 10 जनवरी को जारी की गई थी। मतलब यह कि अब कोरोना से इंफेक्टेड होने वालों के संपर्क में आने वालों में अगर हल्के या कोई लक्षण नहीं हैं तो उनकी कोरोना जांच नहीं होगी। यानी ICMR ने कोरोना के खिलाफ सबसे खास contact tracing की रणनीति को एक तरह से छोड़ दिया है।

अब इस शख्स और उसके संक्रमित परिजनों का न तो टेस्ट होगा और न ही वो आइसोलेट होंगे। ऐसे में ये सभी सदस्य कोरोना के कैरियर बन जाएंगे और वायरस ज्यादा तेजी से फैलने लगेगा। आइए जानते हैं कोरोना पॉजिटिव होने वालों के कॉन्टैक्ट में आने वालों की जांच न कराने के इस फैसले पर एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं…

एसिम्प्टोमेटिक लोगों से भी होता है कोरोना फैलने का खतरा
एक्सपर्ट के मुताबिक, जो लोग एसिम्प्टोमेटिक होते हैं, उनसे भी वायरस फैल सकता है, भले ही उनमें लक्षण न हों या उन्हें वैक्सीन लगी हो। ICMR से पहले स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी हाल ही में नई गाइडलाइन में कहा था कि संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले एसिम्प्टोमेटिक लोगों की टेस्टिंग और आइसोलेशन की जरूरत नहीं है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देश में ओमिक्रॉन केसेज में से करीब 70% मामले एसिम्प्टोमेटिक हैं। ऐसे में सवाल ये है कि कोरोना संक्रमितों के संपर्क में आने वाले एसिम्प्टोमेटिक लोगों की टेस्टिंग के बिना ये कैसे पता चल पाएगा कि कौन कोरोना संक्रमित है और कौन नहीं?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. नरेश गुप्ता ने कहा, ''ओमिक्रॉन के करीब 70% मरीज एसिम्प्टोमेटिक हैं और इस वैरिएंट में तेजी से फैलने की क्षमता है, ऐसे में कम्युनिटी में फैलने के बाद ये आग की तरह फैलेगा क्योंकि आपको पता ही नहीं होगा कि अगला व्यक्ति संक्रमित है या नहीं।'' इसलिए एसिम्प्टोमेटिक लोगों की भी कोरोना टेस्टिंग ही नहीं बल्कि दूसरों में वायरस को फैलने से रोकने के लिए उन्हें आइसोलेट किया जाना और उनका इलाज भी जरूरी है।

देश में हर एसिम्प्टोमेटिक की टेस्टिंग संभव नहीं
भारत में महामारी की शुरुआत के बाद से 10 जनवरी तक कुल 69.31 करोड़ सैंपल की टेस्टिंग हुई थी। 10 जनवरी को देश में 15.79 लाख सैंपल की जांच हुई। पिछले कुछ दिनों में वैरिएंट की तेज रफ्तार के कारण टेस्टिंग बढ़ी है, जिसके आने वाले दिनों में और बढ़ने की संभावना है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एसिम्प्टोमेटिक की टेस्टिंग नहीं कराने के फैसले की एक वजह टेस्टिंग पर दबाव कम करने और सीमित संसाधन भी हैं।

क्या एसिम्प्टोमेटिक के टेस्ट नहीं करने के फैसले की वजह देश में टेस्टिंग के सीमित संसाधन है?
यही सवाल जब हमने महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया से पूछा तो उन्होंने कहा, ''भारत के पास यूएस, यूके जैसे अनलिमिटेड रिर्सोसेज नहीं हैं कि हर एक व्यक्ति का टेस्ट किया जा सके।''

उन्होंने कहा, ''उपलब्ध रिर्सोसेज का बेस्ट यूटिलाइजेशन करना ही इसका मकसद है। हालांकि रिर्सोसेज की कमी नहीं है, लेकिन इनका बेस्ट तरीके से इस्तेमाल जरूरी है। यानी एसिम्प्टोमेटिक की ज्यादा टेस्टिंग की वजह से सिम्प्टोमेटिक लोग टेस्टिंग से वंचित न होने पाएं''

क्या एसिम्प्टोमेटिक की टेस्टिंग नहीं करने से कोरोना फैलेगा?
इस पर डॉ. लहरिया ने कहा, ''सैद्धांतिक तौर पर तो इससे कोरोना फैलने का खतरा बढ़ता है, लेकिन टेस्टिंग से हर किसी के संक्रमण की स्थिति जान पाना भी मुश्किल है। ऐसे में टेस्टिंग नहीं करने से कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा।''

एसिम्प्टोमेटिक लोगों की टेस्टिंग नहीं करना कितना सही है?
इस पर डॉ. लहरिया ने कहा, ''पहले कोरोना से सिम्प्टोमेटिक बीमारी और वायरस का ज्यादा ट्रांसमिशन हो रहा था, तब टेस्टिंग का फायदा था। अब बीमारी ज्यादा फैल चुकी है। ऐसे में हर एसिम्प्टोमेटिक को पहचान पाना मुश्किल है और टेस्टिंग करने से बीमारी का स्प्रेड नहीं रुकता है।''

कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों को क्या करना चाहिए?
इस पर डॉ. लहरिया ने कहा, ''अगर कोरोना संक्रमित के संपर्क में आए हैं और आपको माइल्ड सिम्प्टम्स भी हैं तो आपको कोरोना हो सकता है, ऐसे में 7 दिन के आइसोलेशन का पालन करना चाहिए। अगर कोई एसिम्प्टोमेटिक व्यक्ति खुद टेस्ट कराना चाहता है तो वह ऐसा करा सकता है, गाइडलाइन में ऐसे लोगों की टेस्टिंग पर रोक नहीं है।''

क्यों उठ रहे हैं सरकार के फैसले पर सवाल?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की परिभाषा के अनुसार एसिम्प्टोमेटिक ऐसे केस होते हैं, जिनमें लैब में किसी व्यक्ति के कोविड ​-19 से संक्रमित पाए जाने की पुष्टि होती है, लेकिन व्यक्ति में कोई लक्षण नहीं होते हैं। खास बात ये है कि कोरोना संक्रमित लोग लक्षण होने पर और लक्षण नहीं होने पर भी वायरस का ट्रांसमिशन कर सकते हैं।

कोरोना से संक्रमित या टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने वाले हर व्यक्ति में जरूरी नहीं है कि लक्षण दिखें, यानी कोरोना संक्रमित कई लोग बिना लक्षण वाले या एसिम्प्टोमेटिक भी हो सकते हैं। ऐसे लोगों को एसिम्प्टोमेटिक कैरियर कहा जाता है। इसलिए कोरोना से संक्रमित बिना लक्षण या एसिम्प्टोमेटिक लोगों को भी आइसोलेट किया जाना चाहिए, तभी वायरस ट्रांसमिशन की चेन टूट सकती है।

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