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भास्कर एक्सप्लेनर:कोरोना के जिस डेल्टा वैरिएंट का खतरा है, उसके खिलाफ हमारी वैक्सीन टिकेगी या नहीं? जानिए नए वैरिएंट पर कितनी असरदार है हमारी वैक्सीन

4 महीने पहलेलेखक: आबिद खान
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देश अभी कोरोना की दूसरी लहर से उबर भी नहीं पाया है कि तीसरी लहर का खतरा मंडराने लगा है। अब तक पांच से ज्यादा स्टडी में तीसरी लहर आने की आशंका जताई गई है। WHO ने कहा है कि कोरोनावायरस का डेल्टा वैरिएंट तीसरी लहर का कारण बन सकता है। भारत में इसी वैरिएंट ने दूसरी लहर को भयावह बनाया था। डेल्टा वैरिएंट दुनिया के 100 देशों में पहुंच चुका है।

वैक्सीनेशन में आगे चल रहे इजराइल, UK और अन्य देशों में इसकी वजह से नए केस भी तेजी से बढ़े हैं। पर अच्छी बात यह है कि हमारे यहां भी वैक्सीनेशन ने रफ्तार पकड़ ली है। जितने ज्यादा लोग वैक्सीनेट हो जाएंगे, तीसरी लहर को रोकने में उतनी ही मदद मिलेगी। लेकिन क्या वायरस के बदलते स्वरूप पर हमारी वैक्सीन कारगर है? क्या वायरस की तरह हम वैक्सीन को भी बदल रहे हैं?

इस एक्सप्लेनर में हम आपको कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं...

सबसे पहले समझिए डेल्टा वैरिएंट क्या है?
कोरोनावायरस खुद को मजबूत बनाने के लिए अपने ओरिजिनल स्ट्रक्चर में लगातार बदलाव कर रहा है। ये बदलाव वायरस के नए-नए रूप को जन्म दे रहे हैं, जिन्हें वैरिएंट कहा जाता है। भारत में कोरोनावायरस का डबल म्यूटेंट स्ट्रेन मिला था, जिसे डेल्टा (B.1.617.2) नाम दिया गया था। ये कोरोना के ओरिजिनल स्ट्रेन के मुकाबले 60% तक ज्यादा संक्रामक है।

डेल्टा के खिलाफ वैक्सीन कितनी प्रभावी है?
फिलहाल भारत में कोवीशील्ड, कोवैक्सिन और स्पुतनिक V को मिलाकर तीन वैक्सीन लग रही हैं। तीनों का ही असर अलग-अलग है। डेल्टा वैरिएंट पर इसके असर को लेकर अलग-अलग स्टडी हुई है। आइए जानते हैं कि इनके नतीजे क्या रहे हैं-

कोवीशील्डः ICMR का दावा- 16% लोगों में एंटीबॉडी नहीं बनी

  • ICMR की नई स्टडी कहती है कि कोवीशील्ड के दोनों डोज ले चुके 16% लोगों में डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ एंटीबॉडी नहीं बनी है। जिन्हें कोवीशील्ड का 1 डोज दिया गया था, उनमें 58.1% लोगों के सीरम सैंपल में भी एंटीबॉडी नहीं मिली है।
  • कोरोना के अल्फा वैरिएंट के मुकाबले डेल्टा वैरिएंट पर कोवीशील्ड कम प्रभावी है। कोवीशील्ड के दोनों डोज ले चुके लोगों में अल्फा के मुकाबले डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ 69% कम एंटीबॉडी बनी है।
  • हालांकि, ICMR की एक और स्टडी कहती है कि कोरोना से रिकवर होने के बाद वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ ज्यादा प्रभावी है।

कोवैक्सिनः डेल्टा के खिलाफ 65% इफेक्टिव
भारत बायोटेक ने हाल ही में कोवैक्सिन के फेज-3 ट्रायल डेटा जारी किया है। इसमें वैक्सीन की एफिकेसी 77.8% होने का दावा किया गया है। देशभर के 25 हॉस्पिटल में 18 से 98 साल की उम्र के 25 हजार 800 लोगों पर भारत बायोटेक ने ये ट्रायल किए थे। कंपनी का कहना है कि ट्रायल में डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ भी वैक्सीन 65% इफेक्टिव पाई गई है।

स्पुतनिक V: डेल्टा के खिलाफ सबसे असरदार होने का दावा
स्पुतनिक V को बनाने वाले मॉस्को के गामालेया इंस्टीट्यूट ने 29 जून को रिपोर्ट जारी की। दावा किया कि डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ रूसी वैक्सीन 90% इफेक्टिव है। हालांकि, ओरिजिनल वायरस के खिलाफ स्पुतनिक V की इफेक्टिवनेस 92% रही है।

मॉडर्नाः सभी वैरिएंट्स के खिलाफ प्रभावी होने का दावा
मॉडर्ना की mRNA वैक्सीन जल्द ही भारत में आने वाली है। इसे सरकार ने इमरजेंसी अप्रूवल दे दिया है। डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ मॉडर्ना ने वैक्सीन की एफिकेसी पता करने के लिए 8 लोगों पर स्टडी की थी। इसके आधार पर कंपनी ने दावा किया कि सभी वैरिएंट्स के खिलाफ वैक्सीन प्रभावी है। हालांकि, अल्फा वैरिएंट के मुकाबले डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ वैक्सीन केवल आधी एंटीबॉडी ही बना रही है। अभी स्टडी के फाइनल नतीजे आना बाकी हैं।

जॉनसन एंड जॉनसनः इफेक्टिव होने का दावा, पर रिपोर्ट का इंतजार
भारत में जॉनसन एंड जॉनसन की सिंगल डोज वैक्सीन के अप्रूवल को लेकर प्रयास तेज हो गए हैं। जल्द ही यह वैक्सीन भी भारत में उपलब्ध हो सकती है। कंपनी ने 1 जुलाई को जारी रिपोर्ट में दावा किया कि वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ असरदार है। पर अभी इसकी स्टडी की फाइनल रिपोर्ट पब्लिश होने का इंतजार है।

इंग्लैंड में हुई स्टडी के नतीजे क्या रहे हैं?
पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ने फाइजर और एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का डेल्टा वैरिएंट पर प्रभाव जानने के लिए 12 अप्रैल से 4 जून के बीच 14 हजार लोगों पर स्टडी की गई। स्टडी में ये बातें सामने आईं।

  • फाइजरः एक डोज लगवाने के बाद फाइजर वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित होने के बाद हॉस्पिटलाइजेशन से बचाने में 94% कारगर है। वहीं दोनों डोज लगवाने के बाद ये आंकड़ा 96% हो जाता है।
  • एस्ट्राजेनेकाः एक डोज के बाद डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित लोगों को एस्ट्राजेनेका वैक्सीन हॉस्पिटलाइजेशन से बचाने में 71% कारगर है। वहीं दोनों डोज लगवाने के बाद ये आंकड़ा 92% हो जाता है। यही वैक्सीन भारत में कोवीशील्ड नाम से लग रही है।

UK में इसी तरह की दूसरी स्टडी में बताया गया कि फाइजर और एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के दोनों डोज लेना जरूरी हैं। यह ही डेल्टा वैरिएंट से संक्रमण रोकने में 88% प्रभावी है। हालांकि, सिंगल डोज लेने पर यह वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ केवल 33% ही कारगर साबित हुई है।

वायरस बदल रहा है तो क्या हम वैक्सीन में भी बदलाव कर सकते हैं?
हां। महामारी विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहारिया का कहना है कि अब तक उपलब्ध ज्यादातर वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ प्रभावी साबित हुई हैं। घबराने की बात नहीं है, क्योंकि हमारे पास टेक्नॉलॉजी उपलब्ध है जिससे वैक्सीन को अपडेट किया जा सकता है।

हर वैक्सीन को अलग-अलग टेक्नीक से डेवलप किया गया है। इसमें फाइजर और मॉडर्ना की mRNA वैक्सीन को जीनोमिक सीक्वेंसिंग के जरिए बनाया है। अगर वायरस के जीनोम में बड़ा बदलाव आता है तो वैक्सीन को तेजी से अपडेट किया जा सकता है। वहीं, वायरल वेक्टर वैक्सीन स्पाइक प्रोटीन के पूरे हिस्से के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। वैरिएंट्स की वजह से अगर स्पाइक प्रोटीन के छोटे हिस्से में बदलाव हुआ तो भी वैक्सीन का प्रभाव कम नहीं होगा। हमारे यहां उपलब्ध कोवीशील्ड और स्पुतनिक V वैक्सीन इसी टेक्नीक से बनी हैं।

जहां तक कोवैक्सिन का सवाल है, वह इनएक्टिवेटेड वैक्सीन है और पूरे वायरस के खिलाफ बनी है। इस वजह से ये वैक्सीन वायरस के नए वैरिएंट के खिलाफ भी कारगर है।

क्या हमें एंटीबॉडी बढ़ाने के लिए तीसरे डोज की जरूरत पड़ेगी?
हां। ऐसी स्थिति बन सकती है। UK में सितंबर के बाद बूस्टर डोज देने पर विचार चल रहा है, ताकि नए वैरिएंट के खिलाफ शरीर में एंटीबॉडी की संख्या बढ़ाई जा सके।

फिलहाल उपलब्ध डेटा के आधार पर हम कह सकते हैं कि वैक्सीन लगवाने के बाद 9 से 11 महीने तक आपके शरीर में एंटीबॉडी रहेगी। इसके बाद धीरे-धीरे कम होने लगती है। ऐसे में दोनों डोज ले चुके लोगों को बूस्टर डोज की जरूरत पड़ सकती है। मिडिल ईस्ट के कई देशों में तीसरे डोज के तौर पर फाइजर की वैक्सीन इस्तेमाल हो रही है। इसी तरह भारत समेत ज्यादातर देश वैरिएंट्स से मुकाबले के लिए वैक्सीन के मिक्स एंड मैच पर स्टडी कर रहे हैं।

क्या वैक्सीन से बन रही कम एंटीबॉडी चिंता की वजह बन सकती है?
नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में एंटीबॉडी दो तरह से बनती है। आसान भाषा में समझें तो एक दिखने वाली और एक नहीं दिखने वाली। टेस्ट से दिखने वाली एंटीबॉडी सामने आती है। पर हमारे शरीर में मेमोरी सेल्स होते हैं जो वायरस के आकार-प्रकार को याद रख लेते हैं। जब भी भविष्य में वायरस का हमला होगा तो यह एक्टिव होकर T हेल्पर और किलर सेल बनाने लगते हैं। इसका पता लगाना मुश्किल है। पर विदेश में हुई स्टडी में साबित हुआ है कि मेमोरी सेल्स बोनमैरो में जाकर बैठ जाते हैं और कम मात्रा में एंटीबॉडी छोड़ने लगते हैं।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि शरीर में एंटीबॉडी बिल्कुल नहीं होना और कम होना दो अलग-अलग बातें हैं। वैक्सीन लेने के बाद भले ही आपके शरीर में कम एंटीबॉडी बने, लेकिन वो आपको कोरोना के गंभीर लक्षणों से बचा सकती है।

अभी तक जितनी भी स्टडी हुई है उनसे प्रूव होता है कि वैक्सीन कोरोना के खिलाफ एकमात्र हथियार है। नए वैरिएंट के खिलाफ वैक्सीन भले ही कम एंटीबॉडी बना रही हो, पर ये आपको कोरोना के गंभीर लक्षणों से जरूर बचाएगी।

अंत में… वैक्सीन के दोनों डोज लेना जरूरी है। स्टडी में ये बात सामने आई है कि वैक्सीन के दो डोज एक डोज के मुकाबले ज्यादा असरदार है।

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