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भास्कर एक्सप्लेनर:डेल्टा-प्लस वैरिएंट को क्यों बताया जा रहा है खतरनाक? क्या तीसरी लहर इससे आएगी? हमारी दवाओं और वैक्सीन का क्या होगा

4 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
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कोरोना के बदलते स्वरूप लगातार खतरा बने हुए हैं। भारत में भयावह दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार ठहराए गए डबल म्यूटेंट यानी डेल्टा वैरिएंट में और भी बदलाव हो रहे हैं। नया वैरिएंट भी महाराष्ट्र में ही मिला है, जहां पहली बार नए वैरिएंट के सात केस सामने आ चुके हैं। यह वैरिएंट न केवल भारत बल्कि कई देशों में रिपोर्ट हुआ है। वैज्ञानिक इसे डेल्टा-प्लस वैरिएंट कह रहे हैं।

एक्सपर्ट चेता रहे हैं कि अगर सावधानी नहीं बरती गई तो अगले दो-तीन हफ्तों में महाराष्ट्र में तीसरी लहर आ सकती है। डेल्टा प्लस वैरिएंट पर सवार तीसरी लहर में एक्टिव केसलोड आठ लाख तक पहुंच सकता है और इन मरीजों में 10% बच्चे होंगे।

म्यूटेशंस और वैरिएंट्स क्या हैं?

  • म्यूटेशंस यानी वायरस की मूल जीनोमिक संरचना में होने वाले बदलाव। यह बदलाव ही जाकर वायरस को नया स्वरूप देते हैं, जिसे वैरिएंट कहते हैं। वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर डॉ. गगनदीप कंग का कहना है कि वायरस में बदलाव होना आम है। जैसे-जैसे वायरस फैलेगा, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचने के दौरान उसमें बदलाव होंगे ही।
  • महामारी विशेषज्ञ चंद्रकांत लहारिया कहते हैं कि यह स्पेलिंग मिस्टेक की तरह है। दवाओं और एंटीबॉडी से बचने के लिए वायरस में यह बदलाव होता है। यह स्वाभाविक है। पर अगर महामारी में वायरस को रोकना है तो उससे दो कदम आगे रहना होगा। इसके लिए उसमें हो रहे प्रत्येक बदलाव पर नजर रखनी बेहद जरूरी है।

यह डेल्टा-प्लस वैरिएंट क्या है?

  • भारत में मिले कोरोनावायरस के डबल म्यूटेंट स्ट्रेन B.1.617.2 को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डेल्टा नाम दिया है। B.1.617.2 में एक और म्यूटेशन K417N हुआ है, जो इससे पहले कोरोनावायरस के बीटा और गामा वैरिएंट्स में भी मिला था। नए म्यूटेशन के बाद बने वैरिएंट को डेल्टा+ वैरिएंट या AY.1 या B.1.617.2.1 कहा जा रहा है।
  • K417N म्यूटेशन वाले यह वैरिएंट्स ओरिजिनल वायरस से अधिक इंफेक्शियस हैं। वैक्सीन व दवाओं के असर को कमजोर कर सकते हैं। दरअसल, B.1.617 लाइनेज से ही डेल्टा वैरिएंट (B.1.617.2) निकला है। इसी लाइनेज के दो और वैरिएंट्स हैं- B.1.617.1 और B.1.617.3, जिनमें B.1.617.1 को WHO ने वैरिएंट ऑफ इंटरेस्ट (VOI) की लिस्ट में रखा है और कप्पा नाम दिया है।

भारत में इस डेल्टा-प्लस वैरिएंट के केस कितने मिले हैं?

  • अब तक डेल्टा-प्लस वैरिएंट से इंफेक्शन के 7 मामलों की पुष्टि हुई है। 5 भारतीय लैब्स ने मई और जून में ग्लोबल इनिशिएटिव ऑन शेयरिंग ऑल इनफ्लुएंजा डेटा (GISAID) को इस वैरिएंट की सूचना दी है। भारत में 28 हजार से अधिक कोरोनावायरस सैंपल्स की जीनोम सिक्वेंसिंग हुई है।
  • पर रिपोर्ट हुए केस की संख्या से यह समझना मुश्किल है कि वैरिएंट कितना प्रभावी है। यह इस पर भी निर्भर करता है कि कितने सैंपल्स की सीक्वेंसिंग की गई है। UK में 4.66 लाख सैम्पल की सीक्वेंसिंग हुई तो 45 में AY.1 मिला। इसी तरह US में 5.49 लाख सैंपल्स में 12 केस में इसकी पुष्टि हुई है। इसकी तुलना में भारत में सिर्फ 5% (28 हजार) सैंपल्स की ही सीक्वेंसिंग की गई है।

क्या डेल्टा-प्लस वैरिएंट को लेकर डरने की जरूरत है?

  • फिलहाल नहीं। नीति आयोग के सदस्य (हेल्थ) डॉ. वीके पॉल का कहना है कि अब तक डेल्टा-प्लस वैरिएंट भारत में वैरिएंट ऑफ कंसर्न नहीं बना है। न ही इसे WHO ने अपने VOC लिस्ट में रखा है। भारत में सिर्फ इसकी मौजूदगी मिली है, उसी आधार पर ग्लोबल डेटा सिस्टम को रिपोर्ट किया गया है।
  • पर दिल्ली एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने पिछले हफ्ते एक TV चैनल से कहा कि हम इस वायरस को हल्के में नहीं ले सकते। हमें यह समझना होगा कि वायरस बदल रहा है। वह जिंदा रहना चाहता है और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इंफेक्ट करना चाहता है। UK से सबक लेना चाहिए, जहां अनलॉक शुरू होते ही नए केस सामने आ रहे हैं। डेल्टा वैरिएंट और इसका नया रूप ज्यादा लोगों को इंफेक्ट कर रहा है। सावधान नहीं रहे तो डेल्टा प्लस वैरिएंट हमारे लिए भी वैरिएंट ऑफ कंसर्न बन जाएगा। भारत को UK से सबक लेना चाहिए, जहां केस तेजी से बढ़ रहे हैं।

तो क्या भविष्य में यह चिंता का कारण बन सकता है?

  • हां। हमने डेल्टा वैरिएंट की वजह से हाल ही में दूसरी खतरनाक लहर का सामना किया है। केस कम हो रहे हैं, पर उन्हें फरवरी के स्तर तक पहुंचने में जुलाई का दूसरा हफ्ता लग सकता है। मई के अंत तक जुटाए गए 21 हजार कम्यूनिटी सैंपल्स में से 33% में डेल्टा वैरिएंट मिला है। यह वैरिएंट उस स्ट्रेन से बहुत अलग है, जिसके खिलाफ फार्मा कंपनियों ने मौजूदा वैक्सीन बनाई है। टेस्ट करने होंगे ताकि पता चल सके कि नए वैरिएंट्स पर यह वैक्सीन कितनी कारगर है।
  • UK, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में हुए टेस्ट बताते हैं कि वैक्सीन इफेक्टिव तो है, पर जब उन्हें डेल्टा जैसे वैरिएंट्स के खिलाफ जांचा गया तो वह कुछ ही एंटीबॉडी बनाने में सफल रहे हैं। चिंता यह है कि डेल्टा वैरिएंट के कई नए रूप सामने आ चुके हैं। भारत समेत कई देशों में यह प्रमुख वैरिएंट बनकर उभरा है। आगे चलकर भारत में यह महामारी के प्रबंधन में चुनौती बन सकता है।

क्या हमारी वैक्सीन इन वैरिएंट्स के खिलाफ असरदार हैं?

  • हां। कुछ हद तक। भारत में ICMR-NIV (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरलॉजी) और CSIR-CCMB (सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्युलर बायोलॉजी, हैदराबाद) ने स्टडी की है। इसमें डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ कोवीशील्ड और कोवैक्सिन का असर देखने की कोशिश की गई है। नतीजे बताते हैं कि वैरिएंट के खिलाफ एंटीबॉडी तो बन रही है, पर वह ओरिजिनल कोरोनावायरस के मुकाबले बन रही एंटीबॉडी के मुकाबले कम है।
  • विशेषज्ञ कहते हैं कि एंटीबॉडी लेवल कभी भी इम्यूनिटी का इकलौता मार्कर नहीं होता। डेल्टा-प्लस वैरिएंट से वायरस तेजी से फैल रहा है, इसके भी बहुत कम सबूत हैं। इस वजह से WHO ने फिलहाल वैरिएंट्स ऑफ कंसर्न (VOC) लिस्ट में इसे नहीं रखा है।
  • इंग्लैंड में जो 36 डेल्टा-प्लस मरीज मिले हैं, उनमें से 18 ने वैक्सीन नहीं ली थी। सिर्फ दो ने वैक्सीन के दोनों डोज लिए थे। अच्छी बात यह है कि इन 36 केसेस में कोई भी मौत नहीं हुई है। इसी तरह डेल्टा-प्लस केसेस में सिर्फ दो ही 60+ के थे। यानी ज्यादातर केस 60 वर्ष से कम उम्र वालों में है।

क्या डेल्टा-प्लस वैरिएंट पर मौजूदा दवाएं कारगर हैं?

  • डेल्टा प्लस में मौजूद K417N म्यूटेशन की वजह से दवाओं के असर को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। CSIR-IGIB (इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी) के डेटाबेस के मुताबिक यह म्यूटेशन हाल में डेवलप मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ट्रीटमेंट ड्रग- कासिरिविमाब और इम्देविमाब के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर चुका है।
  • यह नई दवा हाई रिस्क वाले मरीजों को दी जा रही है, जिनमें मॉडरेट और गंभीर लक्षण हैं। भारत में इस दवा की मार्केटिंग रोश और सिप्ला कर रहे हैं और इसे सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (CDSCO) ने अप्रूवल दिया है। एक डोज (1200 मिग्रा-600 मिग्रा कासिरिविमाब और 600 मिग्रा-इम्डेविमाब का कम्बाइंड डोज) की कीमत 59,750 रुपए है।
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