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भास्कर एक्सप्लेनर:बच्चों में बढ़ रहा है कोरोना वायरस इन्फेक्शन; एक्सपर्ट्स से जानिए बच्चों को कैसे प्रभावित कर रहा खतरनाक वायरस

5 महीने पहलेलेखक: रवींद्र भजनी
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कोरोना वायरस की दूसरी लहर में केस लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। रविवार को पहली बार नए इन्फेक्शन के मामलों ने एक लाख का आंकड़ा पार किया। इस बार बच्चों में भी कोरोना वायरस इन्फेक्शन सामने आया है। सरकार के अनुसार देश के 18 राज्यों में वायरस के नए वैरिएंट्स मिले हैं, जो तेजी से इन्फेक्शन फैलने का कारण हो सकते हैं। हाल ही में दिल्ली एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि दूसरी लहर में बच्चे भी बड़ी संख्या में इन्फेक्ट हुए हैं।

हाल ही में रिपोर्ट आई कि बेंगलुरू में 400 बच्चों को कोरोना इन्फेक्शन हो चुका है। इस पर डॉ. गुलेरिया ने कहा कि अब स्कूल खुल चुके हैं। बच्चे एक-दूसरे से बात कर रहे हैं और अक्सर वे सावधानियों का ध्यान नहीं रखते। इस वजह से कोरोना वायरस उन्हें इन्फेक्ट कर रहा है। वे इतने दिनों तक बचे रहे, इससे उनके शरीर में एंटीबॉडी भी नहीं बनी है। हो सकता है नए वैरिएंट्स की वजह से उन्हें इन्फेक्शन हो रहा हो। इस मामले में हमने मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में कंसल्टेंट पीडियाट्रिशियन डॉ. रवीन्द्र चित्तल, बेंगलुरु के एस्टर सीएमआई हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी और स्लीप मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. श्रीकांत जे.टी और पोद्दार फाउंडेशन की मैनेजिंग ट्रस्टी और राउंड ग्लास में मेंटल हेल्थ की ग्लोबल हेड प्रकृति पोद्दार से बात की।

इन 5 प्रश्नों के जरिये जानिए बच्चों में कोरोना इन्फेक्शन के केस क्यों बढ़ रहे हैं और यह उन्हें किस तरह प्रभावित कर रहा है-

1. पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर में बड़ी संख्या में बच्चे इन्फेक्ट हो रहे हैं, ऐसा क्यों?

बेंगलुरु के डॉ. श्रीकांत जे.टी. कहते हैं कि सितंबर के बाद से कोरोना के केस घटने लगे थे। अनलॉक शुरू हुआ तो पाबंदियां भी हटने लगी थीं। कोरोना वायरस से बचने के लिए जो उपाय करने थे, ज्यादातर लोगों ने इसकी अनदेखी की। इस बर्ताव ने ही दूसरी लहर में केस बढ़ाए हैं। उनका कहना है कि पहली लहर के समय बच्चे घरों में कैद थे। पर पाबंदियां हटते ही वे भी बाहर निकले और इन्फेक्ट हुए।

वहीं, मुंबई के डॉ. चित्तल ने कहा कि मार्च 2020 में पहली लहर शुरू हुई थी। उसके मुकाबले मार्च 2021 में चली दूसरी लहर में लोगों के व्यवहार में बड़ा बदलाव आ गया है। पिछले साल अनजाना डर सता रहा था। मास्क पहनना, हाथ धोना और सोशल डिस्टेंसिंग रखना, तीन अहम नियम थे। सालभर में लोगों को लगा कि ट्रीटमेंट के बाद लोग ठीक हो रहे हैं तो उन्होंने भी महामारी के साथ जीना सीख लिया। इस व्यवहार के चलते अधिक संख्या में बच्चे इन्फेक्टेड वयस्कों के संपर्क में आए। ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वायरस ज्यादा घातक हुआ है, बस लोगों का व्यवहार बदला है, इसलिए अधिक बच्चे वायरस के संपर्क में आए हैं।

2. यह कहा गया कि वायरस का बच्चों पर अधिक असर नहीं होगा। पर अब उनकी तबियत ज्यादा खराब हो रही है, ऐसा क्यों?

इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। पहली लहर में भी बच्चों में मल्टीसिस्टम इनफ्लैमेटरी सिंड्रोम देखा गया। पर उस समय केस कम थे। दूसरी लहर में ऐसे मामले बढ़े हैं। डॉ. श्रीकांत ने कहा कि अब भी ज्यादातर इन्फेक्टेड बच्चों में लक्षण न के बराबर या मॉडरेट ही हैं।

वहीं, डॉ. चित्तल कहते हैं कि ज्यादातर बच्चों के लिए यह आम सर्दी-जुकाम और पेट दर्द जैसा है। पर वे दूसरे लोगों को इन्फेक्ट कर सकते हैं। मल्टी सिस्टम इनफ्लैमेशन में अगर समय पर इलाज न मिला तो यह बीमारी जानलेवा भी हो सकती है। बड़ों में इन्फेक्शन का खतरा बढ़ा है तो बच्चों के वायरस के सामने एक्सपोज होने का खतरा भी बढ़ा है। इस वजह से दूसरी लहर में इसके ज्यादा केस सामने आ सकते हैं।

3. बच्चों का पूरा साल घर पर बीता है। न तो स्कूल गए और न ही खेलकूद में समय बिताया। अब मानसिक समस्याओं का सामना भी कर रहे हैं। इस समस्या से कैसे निपटें?

इस पर विशेषज्ञ एक मत है कि बच्चों को पिछले एक साल में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। डॉ. चित्तल का कहना है कि स्कूल बंद होने और दोस्तों से न मिल पाने का सबसे ज्यादा असर बड़े बच्चों और किशोरों पर पड़ा है। उनमें एंग्जाइटी दिखने लगी है। कई बच्चों में कोरोना इन्फेक्शन का डर भी बैठ गया है। कोरोना से जुड़ी भयावह खबरें, परिवार की कम हुई आय एवं माता-पिता की नौकरियों पर मंडराते संकट ने भी बच्चों में हायपरवेंटिलेशन, बिस्तर गीला करने, हकलाने, गंभीर सिरदर्द जैसी शिकायतों को जन्म दिया है।

वहीं, पोद्दार फाउंडेशन की प्रकृति पोद्दार कहती हैं कि बीते साल में डिप्रेशन, एंग्जाइटी, बोरियत, अनिश्चितताएं कुछ ऐसी चुनौतियां थीं जिनका सामना बच्चों ने किया। दोस्तों से कनेक्शन नहीं होने से डिप्रेशन और एंग्जाइटी को बढ़ावा मिला। इससे निपटने का सिर्फ एक तरीका है कि माता-पिता को बच्चों से जुड़ना होगा। उनके साथ इनडोर गेम्स खेलने होंगे। बच्चों के लिए इमोशनल सेफ्टी सबसे जरूरी है, ताकि वे सुरक्षित और कनेक्टेड महसूस करें।

वहीं, डॉ. श्रीकांत भी इस समस्या से निपटने के लिए पैरेंट्स की ओर ही देख रहे हैं। उनका कहना है कि पैरेंट्स को इनोवेटिव होना होगा। बच्चों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा। खाना बनाने, साफ-सफाई और घर के अन्य कामों में उन्हें जोड़ना होगा। पैरेंट्स बैडमिंटन जैसे खेल अपने बच्चों के साथ खेल ही सकते हैं।

यूनिसेफ ने भी बच्चों पर कोरोना के असर को लेकर स्टडी की है। साथ ही यह भी बताया है कि पैरेंट्स को क्या करना चाहिए। फोटो-यूनिसेफ
यूनिसेफ ने भी बच्चों पर कोरोना के असर को लेकर स्टडी की है। साथ ही यह भी बताया है कि पैरेंट्स को क्या करना चाहिए। फोटो-यूनिसेफ

4. बच्चों के लिए किस तरह की गतिविधियां सुरक्षित रहेंगी?

ऑनलाइन एजुकेशन ने कई बच्चों को उन गैजेट्स से जोड़ दिया है, जिनसे अब तक उन्हें दूर रहने को कहा जाता था। डॉ. चित्तल का कहना है कि हम बच्चों से कहते थे कि मोबाइल, टैबलेट्स, टीवी या प्लेस्टेशन पर ज्यादा वक्त मत बिताओ। पर बीते एक साल में बच्चों ने इनके साथ ही तो वक्त बिताया है। शारीरिक गतिविधियां न होने से वजन भी बढ़ा है। ऐसे में पैरेंट्स को कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे मनोरंजक और रुचिकर किताबें पढ़ें, पेंटिंग, डांसिंग या म्यूजिक में ज्यादा वक्त बिताएं।

प्रकृति भी इस मामले में डॉ. चित्तल से सहमत हैं। वह कहती हैं कि बच्चों को अच्छी आदतें लगाना जरूरी हैं। उन्हें इनडोर गार्डनिंग के जरिए मिट्टी से जोड़ा जाए तो डिप्रेशन दूर करने में मदद मिलेगी। योगा, डांस और कसरत से टेंशन कम होता है। सबसे महत्वपूर्ण है कनेक्टेड महसूस करना। डिप्रेशन और एंग्जाइटी कम करने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं है। वहीं, डॉ. श्रीकांत कहते हैं कि ऐसी गतिविधियां जहां बहुत ज्यादा मेल-मिलाप की जरूरत नहीं है, उनमें बच्चों को जोड़ना चाहिए। माता-पिता उन्हें दौड़ने या पैदल सैर पर साथ ले जा सकते हैं।

5. भारत में 45+ का वैक्सीनेशन शुरू हो गया है। बच्चों को वैक्सीन कब मिलेगी?

दरअसल, भारत में दो वैक्सीन लगाई जा रही है- कोवैक्सिन और कोवीशील्ड। दोनों ही वैक्सीन का 18 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों पर ही ट्रायल हुआ है। कोवैक्सिन के फेज-2 ट्रायल्स में जरूर 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को शामिल किया गया था, पर बड़े पैमाने पर ट्रायल्स नहीं हुए थे।

अमेरिका में फाइजर ने बच्चों पर ट्रायल्स शुरू किए हैं। जो भी वैक्सीन बच्चों को लगाई जाएगी, उसके ट्रायल्स कराए जाएंगे। पिछले महीने सरकार ने बताया था कि कोवैक्सिन के बच्चों पर ट्रायल्स शुरू होंगे। पर अभी उसमें देर है। डॉ. श्रीकांत के मुताबिक वैक्सीन की इफेक्टिवनेस और डोज की मात्रा तय होने पर ही बच्चों पर उसका इस्तेमाल सुरक्षित होगा। फिलहाल तो स्टडी ही चल रही है।

डॉ. चित्तल का कहना है कि दुनिया के किसी भी देश में फिलहाल गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं और 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कोविड-19 वायरस के खिलाफ वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। प्रकृति का कहना है कि दुनियाभर में बच्चों की वैक्सीन पर काम चल रहा है। आने वाले दिनों में बच्चों के लिए भी वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी। तब तक इंतजार ही करना होगा। साथ ही उन्हें हाथ धोने, सोशल डिस्टेंसिंग रखने और मास्क पहने रखने के लिए तैयार करना होगा।

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