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भास्कर एक्सप्लेनर:ठीक होने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता कोरोना, ध्यान नहीं दिया तो आंख तक निकालनी पड़ सकती है; जानें ब्लैक फंगस के बारे में सबकुछ

एक महीने पहलेलेखक: जयदेव सिंह
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49 साल की मीना खंडेलवाल 10 अप्रैल को कोरोना पॉजिटिव हुईं। इलाज के दौरान उन्हें स्टेराॅयड दिए गए। उन्हें साइड इफेक्ट हो गया। इससे उनके चेहरे पर सूजन आ गई। 20 अप्रैल को उन्हें इलाज के लिए जयपुर लाया गया। इलाज चला लेकिन उनकी एक आंख नहीं बच पाई।

46 साल के ताराचंद 27 अप्रैल को संक्रमित हुए। स्टेराॅयड देने के कुछ ही दिन में साइड इफेक्ट आने लगे। उनकी दोनों आंखें नहीं बचाई जा सकीं। 42 साल के मुनाफ की कोविड रिपोर्ट तो निगेटिव आई, लेकिन CT स्कैन में इंफेक्शन आया। उन्हें भी स्टेराॅयड दिए गए। इसके महज पांच दिन बाद उनकी दोनों आंखें प्रभावित हो गईं और सर्जरी के बाद भी दोनों आंखें नहीं बचाई जा सकीं। मीना, ताराचंद और मुनाफ तीनों को डायबिटीज भी है।

ये कुछ कहानियां हैं देश में कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों की, जो एक नई बीमारी से जूझ रहे हैं। ये बीमारी इतनी खतरनाक है कि लोगों की जान बचाने के लिए उनके शरीर के अंग तक काटकर निकालने पड़ रहे हैं। ऐसे ही कई मामले राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, गुजरात में सामने आ चुके हैं। दिसंबर में इसके कुछ मामले देश में आए थे।

अब फिर से इसके कई केस अलग-अलग राज्यों में सामने आ रहे हैं। इनमें से कुछ मरीजों की मौत हो गई तो कुछ को संक्रमण से बचाने के लिए उनकी आंखें तक निकालनी पड़ी। इस नए संक्रमण का नाम है ब्लैक फंगस। हालांकि, नीति आयोग ने कहा है कि देश में इसके मामले बहुत ज्यादा नहीं हैं। ज्यादातर उन्हीं लोगों में संक्रमण हो रहा है जिन्हें पहले से डायबिटीज है।

ये नई बीमारी है क्या? इसके लक्षण क्या हैं? ये कितनी खतरनाक है? अगर ये बीमारी किसी को हो जाए तो मौत की आशंका कितनी है? इससे कैसे बच सकते हैं? इन सब सवालों के बारे में हमने बात की भोपाल के कैंसर अस्पताल में कोविड से जुड़ी सेवाएं दे रहीं डॉक्टर पूनम चंदानी से…

क्या है ब्लैक फंगस?
ये एक फंगल डिजीज है। जो म्यूकॉरमाइटिसीस नाम के फंगाइल से होता है। ये ज्यादातर उन लोगों को होता है जिन्हें पहले से कोई बीमारी हो या वो ऐसी मेडिसिन ले रहे हों जो बॉडी की इम्युनिटी को कम करती हों या शरीर की दूसरी बीमारियों से लड़ने की ताकत कम करती हों। ये शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है।

ये शरीर में कैसे पहुंचता है और इससे क्या असर पड़ सकता है?
ज्यादातर सांस के जरिए वातावरण में मौजूद फंगस हमारे शरीर में पहुंचते हैं। अगर शरीर में किसी तरह का घाव है या शरीर कहीं जल गया तो वहां से भी ये इंफेक्शन शरीर में फैल सकता है। अगर इसे शुरुआती दौर में ही डिटेक्ट नहीं किया जाता तो आंखों की रोशनी जा सकती है। या फिर शरीर के जिस हिस्से में ये फंगस फैला है शरीर का वो हिस्सा सड़ सकता है।

ब्लैक फंगस आंख की पुतलियों या आसपास का एरिया पैरालाइज्ड कर सकता है।
ब्लैक फंगस आंख की पुतलियों या आसपास का एरिया पैरालाइज्ड कर सकता है।

ब्लैक फंगस कहां पाया जाता है?
ये बहुत गंभीर लेकिन एक रेयर इंफेक्शन है। ये फंगस वातावरण में कहीं भी रह सकता है, खासतौर पर जमीन और सड़ने वाले ऑर्गेनिक मैटर्स में। जैसे पत्तियों, सड़ी लड़कियों और कम्पोस्ट खाद में ब्लैक फंगस पाया जाता है।

इसके लक्षण क्या हैं?
शरीर के किस हिस्से में इंफेक्शन है उस पर इस बीमारी के लक्षण निर्भर करते हैं। चेहरे का एक तरफ से सूज जाना, सिरदर्द होना, नाक बंद होना, उल्टी आना, बुखार आना, चेस्ट पेन होना, साइनस कंजेशन, मुंह के ऊपर हिस्से या नाक में काले घाव होना जो बहुत ही तेजी से गंभीर हो जाते हैं।

ये इंफेक्शन किन लोगों को होता है, क्या इसका कोरोना से कोई कनेक्शन है?

  • डॉक्टर पूनम कहती हैं कि ये उन लोगों को होता है जो डायबिटिक हैं, जिन्हें कैंसर है, जिनका ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुआ हो, जो लंबे समय से स्टेरॉयड यूज कर रहे हों, जिनको कोई स्किन इंजरी हो, प्रिमैच्योर बेबी को भी ये हो सकता है।
  • कोरोना जिन लोगों को हो रहा है उनका भी इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। अगर किसी हाई डायबिटिक मरीज को कोरोना हो जाता है तो उसका इम्यून सिस्टम और ज्यादा कमजोर हो जाता है। ऐसे लोगों में ब्लैक फंगस इंफेक्शन फैलने की आशंका और ज्यादा हो जाती है।
  • दूसरा कोरोना मरीजों को स्टेरॉयड दिए जाते हैं। इससे मरीज की इम्यूनिटी कम हो जाती है। इससे भी उनमें ये इंफेक्शन फैलने की आशंका ज्यादा हो जाती है।

ये फंगस कितना खतरनाक है?

  • ये कम्युनेक्लब डिजीज नहीं है यानी ये फंगस एक मरीज से दूसरे मरीज में नहीं फैलता है, लेकिन ये कितना खतरनाक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके 54% मरीजों की मौत हो जाती है। शरीर में इंफेक्शन कहां है उससे मोटर्लिटी रेट बढ़ या घट सकता है। जैसे- साइनस इंफेक्शन में मोटर्लिटी रेट 46% होता है वहीं, फेफड़ों में इंफेक्शन होने पर मोटर्लिटी रेट 76% तो डिसमेंटेड इंफेक्शन में मोटर्लिटी रेट 96% तक हो सकता है। अमेरिकी एजेंसी सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिपोर्ट ये कहती है। इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि ये दुनिया में होने वाले हर तरह के इंफेक्शन में म्यूकॉरमाइटिसीस इंफेक्शन के मामले सिर्फ 2% ही होते हैं।
  • डॉक्टरों का कहना है कि यह फंगस जिस एरिया में डेवलप होता है, उसे खत्म कर देता है। ऐसे में अगर इसका असर सिर में हो जाए तो ब्रेन ट्यूमर समेत कई तरह के रोग हो जाते हैं, जो जानलेवा साबित हो जाता है। समय पर इलाज होने पर इससे बचा जा सकता है। अगर यह दिमाग तक पहुंच जाता है तो मोटर्लिटी रेट 80 फीसदी है। कोरोना के कारण बहुत से लोग कमजोर हो चुके हैं तो ऐसे में ये फंगल इंफेक्शन भी बढ़ा है।

इससे बचा कैसे जा सकता है?

  • डॉक्टर पूनम कहती हैं कि कंस्ट्रक्शन साइट से दूर रहें, डस्ट वाले एरिया में न जाएं, गार्डनिंग या खेती करते वक्त फुल स्लीव्स से ग्लव्ज पहनें, मास्क पहनें, उन जगहों पर जाने बचें जहां पानी का लीकेज हो, जहां ड्रेनेज का पानी इकट्ठा हो वहां न जाएं।
  • जिन लोगों को कोरोना हो चुका है उन्हें पॉजिटिव अप्रोच रखना चाहिए। कोरोना ठीक होने के बाद भी रेगुलर हेल्थ चेकअप कराते रहना चाहिए। अगर फंगस से कोई भी लक्षण दिखें तो तत्काल डॉक्टर के पास जाना चाहिए। इससे ये फंगस शुरुआती दौर में ही पकड़ में आ जाएगा और इसका समय पर इलाज हो सकेगा।
  • इलाज में थोड़ी सी भी देरी से मरीज के शरीर का वो हिस्सा जहां ये फंगल इंफेक्शन हुआ है सड़ने लगता है। इस स्थिति में उसे काटकर निकालना पड़ सकता है। ऐसा नहीं करने पर मरीज की जान भी जा सकती है।
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