पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App
  • Market Watch
  • SENSEX52610.08-0.31 %
  • NIFTY15802.8-0.42 %
  • GOLD(MCX 10 GM)48349-0.2 %
  • SILVER(MCX 1 KG)715020.37 %

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

ओम गौड़ का कॉलम:46.6 प्रतिशत बेरोजगारी दर वाले बिहार के चुनाव में बरस रही हैं नौकरियां

8 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
ओम गौड़, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर - Money Bhaskar
ओम गौड़, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर

बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव में नौकरियों की बरसात हो रही है। राजद के युवा नेता और मुख्यमंत्री के चेहरे तेजस्वी यादव ने सरकार बनते ही पहली कैबिनेट में 10 लाख नौकरियां देने का ऐलान कर प्रदेश की नब्ज टटोली, इस घोषणा से उन्हें भीड़ से राजनीतिक लाभ की आहट सुनाई पड़ी तो मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सवाल खड़ा कर दिया कि पैसा कहां से आएगा?

नीतीश के इस सवाल ने तेजस्वी को जवाब के लिए मजबूर किया, उन्होंने बताया कि राज्य में हर साल 40 हजार करोड़ का बजट लैप्स हो जाता है वह किस काम आएगा। चुनाव में रोजगार का मुद्दा बनता देख भाजपा को अपने घोषणा पत्र में 19 लाख रोजगार सृजित करने की बात करनी पड़ी तो कांग्रेस ने भी 18 माह में साढ़े चार लाख नौकरियां देने का वादा कर चुनाव को रोजगारमय बना दिया। अब सब रोजगार की बात करने लगे तो तेजस्वी का 10 लाख नौकरियों पर सवाल खड़ा करने वाली पार्टियां खामोश हो गईं। बिहार में होने वाली चुनावी रैलियां रोजगार से शुरू होती हैं और रोजगार पर ही खत्म हो रही हैं।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि चुनाव में रोजगार टेस्टेड फार्मूला है। जब मोदी 2014 में दो करोड़ रोजगार के वादे के साथ प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो कोई 10 लाख नौकरियों की बात करके युवा बेरोजगारों को आकर्षित तो कर ही सकता है, देना नहीं देना भविष्य के गर्भ में है। बिहार में बेरोजगारी की दर 46.6% है। रोजगार की घोषणाओं के पीछे बेरोजगारी का ये आंकड़ा बड़ा चुनावी मुद्दा है।

बिहार में भी विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में 15 साल से सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी साफ दिख रही है। पलायन, रोजगार बिहार के हर चुनाव मेंं मुद्दा बनता है लेकिन कोरोना में हुए लॉकडाउन से सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर घरों की तरफ लौट रहे बिहारियों की स्थिति भी चुनाव में एक मार्मिक मुद्दा है।

चुनाव प्रचार में उड़ रहे उड़न खटोले उन लोगों को चिढ़ा रहे हैं जो भूखे रहकर कोसों सफर तय कर पैदल अपने घर पहुंचने को मजबूर हुए। उनका सवाल है कि उन्हें क्यों नहीं घर पहुंचाने में सरकार ने मदद की? नीतीश कुमार ने सरकार में रहते हुए शराबबंदी का साहसिक ऐलान करके महिला वोटर्स को लुभाने का बड़ा कदम उठाया लेकिन मिस मैनेजमेंंट को सरकार समझ पाती इससे पहले भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी और पुलिस ने इस फैसले में इनकम का जरिया तलाश लिया।

चार हजार करोड़ की वार्षिक आय को दांव पर लगाकर नीतीश ने जो फैसला लिया उसे अफसरों और शराब तस्करों के गठजोड़ ने 8 हजार करोड़ में बदल दिया। अब लोजपा कांग्रेस व आरजेडी सहित छोटे मोटे दल वादा कर रहे हैं कि वे सत्ता में आए तो शराबबंदी की समीक्षा करेंगे।

‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ की तर्ज पर तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वैक्सीन दूंगा के साथ कोरोना टीके की भी चुनाव में एंट्री हो चुकी है। भारत-चीन सीमा विवाद और धारा 370 के मुद्दे भी चुनाव में कूद पड़े हैं। क्या-क्या वादे नहीं हो रहे हैं चुनाव में कांग्रेस ने वादा किया है किसानों का कर्जा माफ और बिजली का बिल हाफ। ये चुनावी वादे हैं इन वादों का क्या?

तेजस्वी यादव को चुनावी सभा में जुट रही भीड़ में उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है तो नीतीश की सभाओं में लालू समर्थन में हो रही नारेबाजी से संभलकर भाजपा चिराग के जरिये नीतीश विरोधी हवा में उजाला ढूंढ रही है। भाजपा के चुनावी विज्ञापन इस बात की पुष्टि करते हैं कि विधानसभा चुनाव के पोस्टर पर प्रधानमंत्री है लेकिन भाजपा का मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश कुमार गायब है। पर्दे के पीछे कुछ तो खिचड़ी पक रही है या यूं कहें पक चुकी है।

खबरें और भी हैं...