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NPA से निपटने की योजना:बैंकिंग सिस्टम के लिए संकटमोचन बन सकता है 'बैड बैंक', बजट में हो सकती है इसकी घोषणा

मुंबई10 महीने पहले
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  • बैड बैंक सामान्य बैंकों की तरह काम नहीं करते, इसलिए यह आम लोगों के लिए नहीं होगा
  • रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बैड बैंक के विचार का विरोध किया था

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने हाल ही में एक बैड बैंक (Bad Bank) का आइडिया दिया है। दरअसल, कोरोना संकट के बाद फंसे हुए कर्ज यानी नॉन परफॉर्मिंग असेट्स (NPA) बैंकों के लिए बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। इसी से निपटने के लिए अब बैड बैंक बनाने पर विचार किया जा रहा है। बजट में इसकी घोषणा की जा सकती है।

बैड बैंक की जरूरत क्यों

कोरोना के बाद बिगड़ी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए सरकार ने 30 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर देश के बैंकिंग सिस्टम में बैड बैंक की जरूरत क्यों आन पड़ी है। बैड बैंक क्या हैं, ये कैसे काम करते हैं, अर्थशास्त्रियों की इसके बारे में क्या राय है- यहां हम इन्हीं सवालों के जवाब दे रहे हैं।

क्या है बैड बैंक?
बैड बैंक सामान्य बैंक की तरह नहीं होता। इसका संबंध सिर्फ NPA से है। बैड बैंक को असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी) भी कहा जाता है। यह दूसरे बैंकों के NPA को खरीदता है, और धीरे-धीरे उन कर्जों की वसूली करता है। इस तरह, लोन देने वाले बैंक की बैलेंस शीट में NPA कम हो जाता है।

इससे पहले बैड बैंक कब बना था?

पहला बैड बैंक 1988 में अमेरिका स्थित मैलन बैंक ने गठित किया था। अमेरिका के बाद इस कॉन्सेप्ट को स्वीडन, फिनलैंड, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने भी अपनाया। विश्व अर्थव्यवस्था में जब कर्ज संकट के चलते वर्ष 2008 में आर्थिक मंदी आई, तब भी भारत में बैड बैंक बनाने का विचार किया गया था। वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वे में भी 'पब्लिक सेक्टर असेट रिहेबिलिटेशन एजेंसी' की स्थापना करने की बात की गई थी। 2020 में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने भी फंसे कर्ज की वसूली के लिए बैड बैंक को जरूरी बताया था।

बैड बैंक में कौन से फंसे कर्ज जाएंगे?
क्या बैड बैंक में कोविड-19 के चलते फंसे लोन ही ट्रांसफर होंगे? या फिर बिजली और रियल एस्टेट सेक्टर की कंपनियों को दिए गए लोन को भी इसमें शामिल किया जाएगा? अभी यह स्पष्ट नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि बैड बैंक में सरकार की हिस्सेदारी अधिक रहती है तो बैंकों के एनपीए की कीमत तय करना ही एक समस्या हो सकती है।

सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी बढ़ी तो खतरा बढ़ेगा

अगर बैड बैंक में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी बढ़ती है तो एनपीए को बैड बैंक में लेने के लिए सरकार को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ेगी। यदि एनपीए की कीमत कम आंकी गई तो बैड बैंक का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। क्योंकि, बैंकों के लिए उनके कर्ज के अनुपात में पैसा मिलना मुश्किल हो जाएगा।

आम बैंकों से कितना अलग हैं बैड बैंक?

बैड बैंक सामान्य बैंकों की तरह काम नहीं करते हैं। यानी ये पैसे जमा करने, खाता खोलने या लोन देने का काम नहीं करते। इसलिए, आम नागरिक इन बैंकों के साथ लेन-देन नहीं कर पाएंगे। ये बैंक किसी बैंक की तरह नहीं, बल्कि कंपनी की तरह काम करेंगे। आम नागरिकों की जमा पूंजी से उनका कोई लेना-देना नहीं होगा।

बैड बैंक पर विशेषज्ञों ने क्या कहा?
आरबीआई के पूर्व गर्वनर डी. सुब्बाराव के अनुसार, कोरोना संकट के चलते एनपीए खातों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसलिए बैड बैंक बनना चाहिए। हालांकि नीति आयोग के पूर्व वाइस-चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया के मुताबिक, बैड बैंक की जरूरत नहीं है। NPA से निपटने के लिए बैंकरप्सी कानून काफी हैं। उसका असरदार तरीके से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन बैड बैंक के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि यह फंसे कर्ज को सरकार की एक जेब से दूसरी जेब में डालने जैसा है। इससे हालात नहीं सुधरेंगे।