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बैंकों के निजीकरण का विरोध:करीब 10 लाख बैंक कर्मचारी दो दिन हड़ताल पर रहे, जबकि मोदी सरकार ने 7 सालों में 131 सरकारी कंपनियों में बेची हिस्सेदारी

मुंबई2 महीने पहले
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सरकारी बैंकों की हड़ताल कल खत्म हो गई, आज से बैंक के ग्राहक आसानी से लेनदेन कर पाएंगे। दरअसल, 2 सरकारी बैंकों के निजीकरण के विरोध में देशभर के 10 लाख बैंक कर्मचारी हड़ताल पर थे। इन बैंकों के निजीकरण का ये फैसला वित्त मंत्री ने बजट में लिया था। हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ये भरोसा जरूर दिलाया है कि बैंकों के विलय या निजीकरण से कर्मचारियों के हितों का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। सरकार देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी में भी हिस्सेदारी बेचने की भी तैयारी कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक, मोदी सरकार सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने के लिहाज से अव्वल है।

मोदी सरकार में अब तक 131 कंपनियों की हिस्सेदारी बिक चुकी है, जिससे 3.51 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम जुटाई
बीजेपी सरकार मई 2014 में केंद्र में आई। तब से लेकर अब तक 131 कंपनियों की हिस्सेदारी बेची जा चुकी हैं। इसके जरिए सरकार के खजाने में 3.51 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम आई। ये किसी सरकार में विनिवेश के जरिए जुटाई गई अभी तक की सबसे बड़ी रकम है।

90 के दशक से विनिवेश का सिलसिला शुरू हुआ
1991 में जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब सरकार ने सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर रकम जुटाने के लिए डिसइन्वेस्टमेंट करने का फैसला लिया था। उसके बाद से अब तक के करीब 30 सालों में सरकार डिसइन्वेस्टमेंट के जरिए 4.89 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जुटा चुकी है। सबसे ज्यादा रकम मोदी सरकार में ही जुटाई गई है।

रकम जुटाने के लिए सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचती है सरकार
आर्थिक मामलों के जानकार अर्नब पंड्या ने कहा कि सरकार को देश चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है। ये पैसा सरकार टैक्स के जरिए वसूलती है, लेकिन इतनी रकम से विकास कार्यों का हो पाना संभव नहीं। तो इसके लिए सरकार पैसा जुटाने के लिए सरकारी कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचती और रकम जुटाती है। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब किसी घर में खर्च चलाना मुश्किल होता है, तो लोग अपने पुराने निवेश से पैसा निकाल लेते हैं। ऐसा ही सरकार भी करती है।

सरकार का काम गवर्नेंस का है, बिजनेस करना नहीं: प्रधानमंत्री मोदी
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि सरकार का काम गवर्नेंस का है, बिजनेस करना नहीं। पीएम मोदी की इस बात से अर्नब पंड्या भी सहमति जताते हैं। उन्होंने कहा कि विनिवेश के कुछ फायदे भी हैं। जैसे घाटे में चल रही कंपनियों के सुधार में लगने वाले फंड की जरूरत खत्म होती है, जो सरकार को भुगतान करती है। कंपनी में निजी भागीदारी बढ़ने से कार्य क्षमता भी बढ़ती है। लेकिन कंपनी के प्रमोटर्स बदलने से ग्राहकों के लिए कंपनी की भूमिका में भी बदलाव होता है, जो ग्राहकों के लिए कुछ मायने में नुकसान देय होता है।

बजट में विनिवेश का टार्गेट 1.75 लाख करोड़ किया, पिछले साल 2.10 लाख करोड़ था
केद्रीय बजट में 2021-22 के लिए विनिवेश का लक्ष्य 1.75 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। इसके लिए IDBI बैंक, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, शिपिंग कॉर्प,कंटेनर कॉर्प, निलांचल इस्पात निगम लिमिटेड, पवन हंस,एयर इंडिया सहित अन्य की रणनीतिक बिक्री करेगी। दरअसल, सरकार महामारी के चलते बिगड़ी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए फंड जुटाना चाहती है। 2020-21 के लिए विनिवेश से रकम जुटाने का लक्ष्य 2.10 लाख करोड़ रुपए था

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