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भारत की विकास दर में जनवरी में बड़ी कटौती कर सकता है अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष : गीता गोपीनाथ

2 वर्ष पहले
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ। (फाइल) - Money Bhaskar
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ। (फाइल)
  • गीता गोपीनाथ ने 2025 तक भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था वाले देश बनने पर संदेह जताया
  • आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री ने कहा- भूमि और श्रम सुधारों के दम पर ही देश यह उपलब्धि हासिल कर सकता
  • गीता गोपीनाथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पहली महिला मुख्य अर्थशास्त्री हैं

मुंबई. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अगले साल जनवरी में भारत की विकास दर में बड़ी कटौती कर सकता है। आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने मुंबई में हुए एक कार्यक्रम में इसके संकेत दिए। उन्होंने कहा- बाकी एजेंसियों की तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी इस महीने समीक्षा के बाद भारत के विकास दर में कटौती कर सकता है। 


खपत में गिरावट, निजी निवेश में कमी और सुस्त निर्यात के चलते इस साल सितंबर में भारत की जीडीपी 6 साल के निचले स्तर 4.5 फीसदी पर आ गई। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और दूसरी वित्तीय संस्थाओं ने भी अपनी समीक्षा में वित्तीय वर्ष 2020 में विकास दर कम रहने का अनुमान जताया है।  

गीता गोपीनाथ ने कहा- भारत की विकास दर में हो सकती है बड़ी गिरावट
अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा, भारत इकलौता उभरता हुआ बाजार है, जिसने इस तरह के संकेत दिए हैं। अगर हाल ही में आए डेटा को देखें तो, हमने भारत की विकास दर को लेकर जो अनुमान जताया था। उसमें बड़ी गिरावट हो सकती है। हम जनवरी में इससे जुड़े आंकड़े देंगे। हालांकि यह गिरावट कितनी होगी, इस पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। क्या? भारत की विकास दर पांच फीसदी के अंदर सिमट जाएगी। इससे जुड़े सवाल पर भी वह कुछ नहीं बोलीं।


आईएमएफ ने अपने अक्टूबर के पूर्वानुमान में 2019 में भारत के लिए 6.1 प्रतिशत विकास दर और 2020 में 7 प्रतिशत तक जाने का अनुमान लगाया था। 

आईएमफ की मुख्य अर्थशास्त्री ने कहा-भारत का राजकोषीय घाटा बड़ी चुनौती
इतना ही नहीं, उन्होंने 2025 तक भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने पर भी संदेह जताया। इसके पक्ष में आंकड़े पेश करते हुए आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री ने कहा कि भारत तभी यह लक्ष्य हासिल कर पाता। जब पिछले 6 सालों में उसकी अर्थव्यवस्था 10.5 फीसदी की दर से बढ़ती जबकि इस दौरान यह आंकड़ा 6 फीसदी रहा। उन्होंने साफ कर दिया कि भूमि और श्रम सुधारों के दम पर ही भारत यह उपलब्धि हासिल कर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत में राजकोषीय स्थिति चुनौतीपूर्ण है। और यह घाटा 3.4 फीसदी के पार जा सकता है। 

'राजस्व वृद्धि को लेकर सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए'
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मुख्य अर्थशास्त्री ने केंद्र सरकार की कॉरपोरेट टैक्स घटाए जाने के फैसले की तो तारीफ की। लेकिन राजस्व वृद्धि को लेकर सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम न उठाए जाने से वह मायूस हैं। उनके मुताबिक नीति निर्धारकों को जल्द ही इस दिशा में पहल की जरुरत है। उन्होंने ग्रामीण आय बढ़ाने पर भी ध्यान देने की बात कही।


वहीं, भारत-चीन की अर्थव्यवस्था में से किसकी स्थिति बदतर है, इससे जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि, दोनों देशों के आर्थिक हालात अलग हैं, इसलिए इसकी तुलना नहीं की जा सकती।   

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