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काम की बात:हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते समय क्लेम सेटलमेंट रेशियो और अस्पतालों के नेटवर्क सहित इन 8 बातों का रखें ध्यान

नई दिल्ली2 महीने पहले
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देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर रफ्तार पकड़ चुकी है। कोरोना जैसी बीमारी के इलाज में आपके जीवनभर की सेविंग्स लग सकती हैं। अगर आप इस तरह की स्थिति में नहीं पड़ना चाहते हैं तो जल्द से जल्द हेल्थ इंश्योरेंस ले लें। हेल्थ इंश्योरेंस से आपको न केवल बिना पैसों की चिंता किए सही इलाज मिल सकेगा बल्कि आपकी सेविंग्स भी बची रहेंगी। लेकिन इंश्योरेंस लेते समय भी कई बातों का ध्यान रखना जरूरी है। हम ऐसी ही 8 बातों के बारे में आपको बता रहे हैं।

पॉलिसी में क्या-क्या कवर होगा ये ठीक से समझ लें
बीमा कंपनियां कई तरह की बीमा पॉलिसियां ऑफर कर रहे हैं। हर बीमा कंपनी के अपने नियम होते हैं। हेल्थ पॉलिसी खरीदने से पहले यह समझ लें कि उसमें कितना और क्या-क्या कवर होगा। जिस पॉलिसी में ज्यादा से ज्यादा चीजें जैसे टेस्ट का खर्च और एम्बुलेंस का खर्च कवर हो उस पॉलिसी को लेना चाहिए। ताकि आपको जेब से पैसे खर्च न करने पड़ें।

क्लेम सैटलमेंट रेशियो का रखें ध्यान
अगर आप इंश्योरेंस खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो जिस कंपनी से पॉलिसी ले रहे हैं उसका क्लेम सेटलमेंट रेशियो जरूर देख लें। सेटलमेंट रेशियो का ज्यादा होना बहुत जरूरी होता है। ज्यादा सेटलमेंट रेशियो का मतलब है कि बीमा कंपनी ने ज्यादा क्लेम का निपटारा किया है। इससे पता चलता है कि कंपनी के अंडर-राइटिंग रूल्स ज्यादा सख्त नहीं हैं। जीवन बीमा कंपनियां अपनी सालाना रिपोर्ट में क्लेम सेटलमेंट रेशियो के आंकड़े देती हैं। कंपनी का 3 से 5 साल का क्लेम सेटलमेंट रेशियो देखना चाहिए।

पहले से मौजूद बीमारियां कवर हैं कि नहीं ये भी देखना जरूरी
सभी हेल्थ इंश्योरेंस प्लान पहले से मौजूद बीमारियों को कवर करते हैं। लेकिन, इन्हें 48 महीने के बाद ही कवर किया जाता है। कुछ 36 महीने बाद इन्हें कवर करते हैं। हालांकि, पॉलिसी खरीदते वक्त ही पहले से मौजूद बीमारियों के बारे में बताना होता है। इससे क्लेम सेटेलमेंट में दिक्कत नहीं आती है।

अस्पतालों का नेटवर्क अच्छा हो
किसी भी हेल्थ प्लान में निवेश करने से पहले सुनिश्चित करें कि आप योजना के तहत आने वाले नेटवर्क अस्पतालों पर विचार किया है। नेटवर्क अस्पताल अस्पतालों का एक समूह हैं जो आपको अपनी वर्तमान हेल्थ प्लान को भुनाने की अनुमति देता है। हमेशा उसी प्लान के लिए जाएं जो आपके क्षेत्र में अधिकतम नेटवर्क अस्पताल प्रदान करता है अन्यथा आपका निवेश आपात स्थिति के समय में काम में नहीं आएगा।

को-पे को चुनना पड़ेगा जेब पर भारी
थोड़े पैसे बचाने और प्रीमियम को कम करने के लिए कई बार लोग को-पे की सुविधा ले लेते हैं। को-पे का मतलब होता है कि क्लेम की स्थिति में पॉलिसी धारक को खर्चों का कुछ फीसदी (उदाहरण के लिए 10 फीसदी) खुद भुगतान करना होगा। को-पे को चुनने से प्रीमियम में मिलने वाला डिस्काउंट बहुत ज्यादा नहीं होता। लेकिन आपके बीमार पड़ने पर ये आपकी जेब खाली करा सकता है।

अपनी मेडिकल हिस्ट्री न छुपाएं
हेल्थ पॉलिसी लेते समय कई लोग ऐप्लीकेशन फॉर्म में अपनी मेडिकल हिस्ट्री का खुलासा सही से नहीं करते हैं। कुछ लोग ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का पता होता है कि इन स्थिति जैसे डायबिटीज, ज्यादा ब्लड प्रेशर आदि के बारे में बताने से उनकी ऐप्लीकेशन रिजेक्ट हो सकती है। इस बात का ध्यान रखें कि किसी तथ्य के बारे में नहीं बताना बीमा कंपनियों द्वारा गलत समझा जाता है और वे आपके क्लेम को रिजेक्ट कर सकती हैं।

लिमिट या सब लिमिट वाला प्लान न लें
अस्पताल में प्राइवेट रूम के किराए जैसी लिमिट से बचें। आपके लिए यह जरूरी नहीं है कि इलाज के दौरान आपको किस कमरे में रखा जाए। खर्च के लिए कंपनी द्वारा लिमिट या सब लिमिट तय करना आपके लिए ठीक नहीं है। पॉलिसी लेते समय इस बात का ध्यान रखें। सब-लिमिट का आशय री-इंबर्समेंट की सीमा तय करने से है। मसलन अस्पताल में भर्ती हुए तो कमरे के किराए पर बीमित राशि के एक फीसदी तक की सीमा हो सकती है। इस तरह पॉलिसी की बीमित राशि भले कितनी हो, सीमा से अधिक खर्च करने पर अस्पताल के बिल जेब से चुकाने पड़ सकते हैं।

हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय वेटिंग पीरियड का रखें ध्यान
हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदने का मतलब यह नहीं होता कि पॉलिसी खरीदने के पहले दिन से ही इंश्योरेंस कंपनी आपको कवर करने लगेगी। बल्कि, आपको क्लेम करने के लिए थोड़े दिन रुकना पड़ेगा। पॉलिसी खरीदने के बाद से लेकर जब तक आप बीमा कंपनी से कोई लाभ का क्लेम नहीं कर सकते, उस अवधि को एक हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का वेटिंग पीरियड कहा जाता है। ये अवधि 15 से 90 दिनों तक की हो सकती है। आपको ऐसी कम्पनी से पॉलिसी लेनी चाहिए जिसका वेटिंग पीरियड कम हो।