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गेहूं एक्सपोर्ट बैन के बचाव में आया चीन:G7 देशों से कहा- भारत को दोष देने से ग्लोबल फूड शॉर्टेज का समाधान नहीं होगा

नई दिल्लीएक महीने पहले
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गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन लगाने के भारत के फैसले की G-7 देशों के ग्रुप ने आलोचना की थी। अब भारत के बचाव में चीन का बयान सामने आया है। चीन ने कहा कि विकासशील देशों को दोष देने से ग्लोबल फूड शॉर्टेज का समाधान नहीं होगा।

चीन की सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, 'अब G7 के एग्रीकल्चर मिनिस्टर्स भारत से गेहूं एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध नहीं लगाने का आग्रह कर रहे हैं, तो G7 राष्ट्र अपने एक्सपोर्ट में इजाफा करके फूड मार्केट की सप्लाई को स्थिर करने के लिए खुद कदम क्यों नहीं उठाते?'

भारत गेहूं का दूसरा बड़ा उत्पादक
ग्लोबल टाइम्स ने कहा, 'भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है, लेकिन ग्लोबल व्हीट एक्सपोर्ट में उसकी हिस्सेदारी काफी कम है। इसके उलट अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया सहित कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाएं गेहूं के प्रमुख निर्यातकों में से हैं।'

ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, यदि कुछ पश्चिमी देश पोटेंशियल ग्लोबल फूड क्राइसिस के मद्देनजर गेहूं के एक्सपोर्ट को कम करने का फैसला लेते हैं, तो वे भारत की आलोचना करने की स्थिति में नहीं होंगे। एक ऐसा देश जो अपनी फूड सप्लाई को सिक्योर करने के दबाव का सामना कर रहा है।

जी-7 शिखर सम्मेलन में उठेगा मुद्दा
भारत के गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन लगाने के फैसला पर जर्मनी के कृषि मंत्री केम ओजडेमिर ने कहा था है कि भारत के इस कदम से दुनियाभर में कमोडिटी की कीमतों का संकट बढ़ जाएगा। उन्होंने अगले महीने जर्मनी में जी-7 शिखर सम्मेलन में इस मुद्दे को उठाने की बात भी कही थी।

गेहूं के दाम 60% तक बढ़े
रूस और यूक्रेन दोनों देश गेहूं के बड़े एक्सपोर्टर है और फरवरी में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद सप्लाई की चिंताओं से वैश्विक गेहूं की कीमतें बढ़ गई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम 60% तक बढ़े हैं। भारत गेहूं उत्पादन के मामले में दूनिया में दूसरे नंबर पर है।

यहां सालाना लगभग 107.59 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होता है। इसका एक बड़ा हिस्सा घरेलू खपत में जाता है। भारत में प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और गुजरात हैं।

भारत ने गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन क्यों लगाया?
गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन लगाने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला- गेहूं की सरकारी खरीद कम हुई है। दूसरा- मौसम की मार से गेहूं की फसल पर असर पड़ा है, जिस वजह से पैदावार कम हुई है। ऐसी स्थिति में देश के सामने यह आशंका खड़ी हो गई थी कि कहीं आने वाले समय में गेहूं के भंडार खाली न हो जाएं। सरकार ने यह भी साफ किया है कि जिन कंपनियों-फर्मों को 13 मई तक लेटर ऑफ क्रेडिट (LOC) मिल चुके हैं, वे निर्यात कर सकेंगे।

हालांकि, ये नहीं बताया है कि कितनी कंपनियों को 13 मई तक LOC मिल चुके थे। सरकारी अधिसूचना में कहा गया है कि कई कारणों से दुनिया में गेहूं की कीमतों में उछाल आया है। इससे भारत सहित पड़ोसी देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा हो गया है। इसे ध्यान में रखते हुए निर्यात पर रोक का फैसला लिया गया है।

पिछले महीने 15 तारीख को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि 2022-23 में गेहूं का निर्यात 100 लाख टन पार कर जाएगा। अब सरकार का रुख बदलने से कुछ किसान संगठनों ने विरोध जताया है। उनका कहना है कि इस फैसले से गेहूं के दाम घटेंगे, जिससे किसानों को नुकसान होगा। हालांकि, कुछ संगठनों का कहना है कि इससे आम लोगों को गेहूं उचित कीमत पर मिलेगा।

एक्सपोर्ट पर रोक नहीं लगाते तो क्या होता?
एक्सपोर्ट पर अगर सरकार रोक नहीं लगाती तो 2006-07 जैसे हालात बन सकते थे। उस समय हमें गेहूं इंपोर्ट करना पड़ा था। वो भी लगभग डेढ़ गुना ज्यादा कीमत पर। रोक नहीं लगती तो भारत में गेहूं के दाम 3,000 रुपए प्रति क्विंटल तक उछल सकते थे, जो अभी 2300 रु. के करीब है। आप सोचिए कि अभी देश में गेहूं की कमी नहीं है, फिर भी दाम बढ़ गए हैं। अगर बाद में कमी पड़ती तो क्या हालात होते।