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आर्थिक महाशक्ति बनने को लालायित हैं अमेरिका-चीन

आर्थिक महाशक्ति बनने को लालायित हैं अमेरिका-चीन
विश्व की महाशक्ति बनने की होड़ में अमेरिका और चीन की दौड़ किसी से छुपी नहीं है। दुनिया के किसी भी देश में वर्चस्व जमाने की दौड़ में भी दोनों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा को साफ तौर पर देखा जा सकता है। चाहे वो पूर्वी चीन महासागर में द्वीपों को लेकर जापान-चीन विवाद हो या तिब्बत के स्व-निर्वासित धर्मगुरु दलाई लामा से मुलाकात का मामला।
 
जाहिर तौर पर दोनों में परोक्ष रूप से तनातनी बनी ही रहती है। बावजूद इसके एक सच यह है कि भले ही अमेरिका घोषित तौर पर वर्तमान की आर्थिक और सामरिक महाशक्ति माना जाता हो, लेकिन दूसरा सच यह भी है दुनिया की यह महाशक्ति एशिया की दो महाशक्तियों के कर्ज से बोझ से डूबता जा रहा है।
 
यह कर्ज भी इतना कि अमेरिका की पेशानी पर अब चिंता की लकीरें उभर आ गई हैं। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन उस पर चीन का कर्ज बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी कोषागार के मुताबिक उस पर चीन का 1,300 अरब डॉलर से ज्यादा बकाया है।
 
हाल ही जारी आंकड़ों का हवाला देते हुए अमेरिकी कोषागार ने कहा कि पिछली तिमाही में पहली बार अमेरिका पर चढ़ा चीन का कर्ज 1,300 अरब डॉलर के पार गया। अगर हांगकांग के बॉन्ड भी मिला दिए जाएं  तो इस कर्ज की सीमा 1,440 अरब डॉलर है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच इस तरह का रिश्ता दूसरे मुद्दे पर भी असर डालता है।
 
कुछ महीने पहले अमेरिकी बजट संकट के दौरान चीन ने डॉलर जमा करने की रफ्तार धीमी कर दी। इस दौरान चीन ने अमेरिका को चेतावनी भी दी कि वो बजट घाटे को कम करने कोशिश करे। चीन का यह रवैया वैसा ही लगता है जैसे भारत के किसी गांव में गरीब किसान को कर्ज देने वाले साहूकार का,जो उसे घी-रोटी खाता देखकर खर्च कम कर कर्ज चुकाने की नसीहत देता है।
 
वहीं चीन के इस रवैये से आजिज अमेरिका लगातार चीन से कहता आ रहा है कि वह अपनी मुद्रा का मूल्य बढ़ाए। अमेरिका का आरोप है कि चीन सस्ती मुद्रा के फायदा उठाकर अपना निर्यात चमकाने में लगा है। सस्ते युआन की वजह से अमेरिकी कंपनियां चीनी सामान के सामने नहीं टिक पा रही हैं। दूसरे देशों में भी चीन इस तरह बाजार बढ़ाता जा रहा है। इसके उदाहरण एशियाई देश हैं।
 
विशेषकर भारत के बाजार तो चीनी सामान से पटे पड़े हैं। अमेरिका और चीन कारोबार के मामले में एक दूसरे के सबसे बड़े साझीदार हैं लेकिन व्यापार बुरी तरह चीन के पक्ष में झुका हुआ है। भुगतान संतुलन बरकरार रखने के लिए खस्ताहाल अमेरिकी कोषागार बॉन्ड जारी करता आया है, जिन्हें चीन खरीद रहा है।
 
इस कर्ज से बाहर निकलने के लिए अमेरिकी कोषागार के पास इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं है। अगर अमेरिका डॉलर में भुगतान करेगा तो डॉलर की कीमत ऊपर जाएगी, जिससे अमेरिका की अर्थव्यवस्था को घाटा और चीन को फायदा होगा। चीन के बाद जापान अमेरिका का दूसरा बड़ा कर्जदाता है। वॉशिंगटन पर उसका 1,170 अरब कर्ज चढ़ा है।
 
लेखक जाने-माने कॉलमिस्‍ट और ग्‍लोबल मामलों के विशेषज्ञ हैं। 

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