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टैक्स देनदारी के लिहाज से कैसे तय होती है आमदनी

टैक्स देनदारी के लिहाज से कैसे तय होती है आमदनी

टैक्सपेयर्स के लिए यह जानना जरूरी है कि वित्त वर्ष 2013-14 में आपने जो कमाई की, उस कमाई के टैक्स का आकलन वित्त वर्ष 2014-15 में किया जाएगा। यानि इस इनकम रिटर्न के लिए 2013-14 फाइनेंशियल ईयर होगा और 2014-15 उसका एसेसमेंट ईयर कहलाएगा।
 
यह भी ध्यान रखें कि इनकम टैक्स रिटर्न हर साल एक निश्चित तारीख से पहले दाखिल करना जरूरी होता है। उदाहरण के तौर पर इंडिविजुअल्स के लिए इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि टैक्स देनदारी के लिहाज से आमदनी कैसे तय होती है।
 
कैसे तय होती है आमदनी

इस संदर्भ में सबसे अहम सवाल यह है कि इनकम टैक्स रिटर्न के लिहाज से आमदनी का क्या मतलब है? आम तौर पर आमदनी का संबंध किसी व्यक्ति की सैलरी से होता है। लेकिन इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के लिहाज से आमदनी का विस्तृत अर्थ है। इस लिहाज से आमदनी की परिभाषा है किसी निश्चित अवधि में किसी व्यक्ति, परिवार, कंपनी या ट्रस्ट आदि के धन में कुल बढ़ोतरी।

आम तौर पर किसी व्यक्ति को सैलरी से होने वाली नियमित प्राप्ति या बिजनेस से होने वाली आमदनी को आमदनी माना जाता है। हालांकि, घर की बिक्री, किसी एफडी में निवेश से मिले ब्याज, किसी म्यूचुअल फंड (डेट या इक्विटी) या शेयरों में निवेश से हुई प्राप्ति भी आमदनी की ही श्रेणी में आती है।

संक्षेप में कहें तो आमदनी को पांच श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
  • वेतन से होने वाली आमदनी
  • हाउस प्रॉपर्टी से होने वाली आमदनी
  • किसी कारोबार या प्रोफेशन से प्राप्तियों से होने वाली आमदनी
  • कैपिटल गेन्स से होने वाली आमदनी
  • अन्य स्रोतों से होने वाली आमदनी
यानि इन पांचों स्रोतों को मिला कर जो प्राप्ति होती है, उसे टैक्सेशन के लिहाज से आमदनी माना जाता है।
 
क्या होता है टीडीएस
 
हमारे यहां केंद्र और राज्य सरकारें टैक्स लगाती हैं। इसके अलावा नगरपालिका और स्थानीय परिषदों जैसी स्थानीय संस्थाएं कुछ टैक्स लगाती हैं। भारतीय नागरिकों पर लगाए जाने वाले टैक्स दो हिस्सों में बांटे जा सकते हैं- डायरेक्ट टैक्स (प्रत्यक्ष कर) और इनडायरेक्ट टैक्स (अप्रत्यक्ष कर)।  
 
स्रोत पर कर कटौती या टीडीएस वह निश्चित प्रतिशत होता है, जो सैलरी, कमीशन, रेंट, इंट्रेस्ट या डिविडेंड जैसे विभिन्न प्रकार की अदायगी पर काटा जाता है। यह राशि काट कर सरकारी खाते में जमा की जाती है। टीडीएस काटने के पीछे जो सिद्धांत काम करता है, वह यह है कि आपको अपनी कमाई के अनुपात में टैक्स अदा करना चाहिए।
 
इस काटी गई राशि को उस टैक्सपेयर के ड्यू टैक्स के साथ बाद में एडजस्ट किया जाता है। टीडीएस काटने वाली संस्था को डिडक्टर कहते हैं, जबकि जिस व्यक्ति का टीडीएस कटता है, उसे डिडक्टी कहा जाता है।

(लेखक टैक्सेशन के विशेषज्ञ और प्रशांत मित्तल एंड एसोसिएट्स के प्रोपराइटर हैं)
 

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