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क्‍या है फायदेमंद- घर खरीदना या‍ फिर किराये पर रहना

क्‍या है फायदेमंद- घर खरीदना या‍ फिर किराये पर रहना
 
फाइनेंस मिनिस्‍टर अरुण जेटली का यह बजट गरीबों और किसानों को बेशक राहत देने वाला हो, लेकिन वेतनभोगी वर्ग को खुश होने के लिए इसमें शायद ही कोई कारण है। पहली बार घर खरीदने जा रहे कम इनकम वालों और अपना बिजनेस करने वाले उन लोगों के लिए भले ही इसमें कई घोषणाएं की गई हैं, जो अभी तक एचआरए के दायरे में नहीं आते थे। हालांकि, इन घोषणाओं से उन्‍हें मिलने वाली राहत भी नाकाफी है। ऐसे में यहां जो सवाल सबके जेहन में कौंध रहा है, वह यह है कि अब जबकि सरकार ने पहली बार घर खरीदने वालों को कुछ राहत देने की घोषणा कर दी है। ऐसे में उनके लिए अब अपना घर खरीदना अच्‍छा होगा या फिर किराये पर रहना। 
 
 
जेटली ने 87ए के तहत पांच लाख रुपए की इनकम वाले लोगों के लिए कर छूट की सीमा दो हजार रुपए से बढ़ाकर पांच हजार रुपए कर दी है। जिन लोगों के पास अपना कोई घर नहीं है और वे खुद का काम करते हैं, वैसे लोगों के लिए किराये से जुड़ी राहत को सेक्‍शन 80जीजी के तहत वर्तमान 24 हजार रुपए से बढ़ाकर 60 हजार रुपए कर दिया गया है।
 
अगले फाइनेंशियल ईयर के दौरान पहली बार घर खरीदने जा रहे लोगों को अब 35 लाख रुपए तक के होम लोन पर 50 हजार रुपए प्रतिवर्ष तक की अतिरिक्‍त ब्‍याज छूट मिलेगी, बशर्ते घर की कीमत 50 लाख रुपए से अधिक नहीं हो।
 
फाइनेंस मिनिस्‍टर ने अफॉर्डेबल हाउसिंग की पहुंच में अधिकांश लोगों को लाने की कोशिश करने की बात कही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्‍या सरकार की यह योजना इतनी अ‍च्‍छी है कि आप खुद का घर खरीदने के लिए बाध्‍य हो जाएं। या फिर आपको किराये के घर में भी रहना चाहिए? हम इसे एक उदाहरण के साथ समझते हैं।
 
मान लेते हैं कि राहुल फर्स्‍ट टाइम होमबायर है और उसने 35 लाख के लोन के साथ 50 लाख रुपए मूल्‍य का घर खरीदा है। ऐसे में बजट 2016 की इस संबंध में घोषणा के बाद अब वह 50 हजार रुपए के अतिरिक्‍त लाभ का दावा कर सकेगा। उसे मिलने वाला यह लाभ उसे मिल रही वर्तमान मूलधन और ब्‍याज छूटों के अतिरिक्‍त होगा। प्रिंसिपल रीपेमेंट के मामले में वर्तमान छूट सीमा सेक्‍शन 80सी के तहत 1.5 लाख रुपए और इंटरेस्‍ट कंपोनेंट के मामले में सेक्‍शन 24(बी) के तहत दो लाख रुपए है।
 
इसी तरह, अगर मान लेते हैं कि राहुल सेल्‍फ इम्‍पलॉयड है, जिसे एचआरए के फायदे नहीं मिलते हैं। तो इस स्थिति में वह अपने किराये के घर पर अब 36 हजार रुपए की बचत कर सकता है। अगर आप इन दोनों स्थितियों के बीच तुलना करें तो किराये पर रहने की तुलना में घर खरीदने की स्थिति में आप एक साल में महज 14 हजार रुपए की और बचत कर सकते हैं, जो 1166 रुपए प्रति महीने है।
 
यहां सवाल उठता है कि क्‍या यह फायदा घर खरीदने का निर्णय लेने के लिए पर्याप्‍त है। इसके अलावा, 50 लाख रुपए की सीमा आपके विकल्‍पों को भी सीमित कर देती है। महानगरों, खासकर दिल्‍ली और मुंबई में आप कोई ठीकठाक घर 50 लाख रुपए में नहीं खरीद सकते। इन शहरों के दूरस्‍थ कोनों में भी एक अच्‍छे घर की कीमत एक करोड़ के आसपास या उससे अधिक हो सकती है। ऐसे में आप छोटे शहरों की तरफ रुख करने के लिए विवश हो सकते हैं।
 
बेशक, भारत में अपने घर में रहने को काफी सराहा जाता है, क्‍योंकि माना यह जाता है कि आप कोई घर नहीं खरीदते हैं, बल्कि एसेट बनाते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप किराये के घर में नहीं रह सकते। और कभी-कभी किराये के घर में रहने का निर्णय वित्‍तीय रूप से आपके लिए बेहतर निर्णय साबित हो सकता है।
 
आम धारणा के विपरीत किराये पर रहना हमेशा पैसे की बर्बादी नहीं होती है। इससे मनचाही जगह पर अपनी पसंद के मुताबिक रहने के अलावा लगभग उसी खर्च पर बेहतर लाइफस्‍टाइल जीना भी संभव होता है।
 
भारत के अधिकांश शहरों में घर का किराया प्रॉपर्टी की वैल्‍यू का तीन फीसदी या फिर उससे भी कम होता है। इसका मतलब यह है कि घर खरीदने की स्थिति में दी जाने वाली ईएमआई साफ तौर पर इसकी तुलना में महंगी पड़ती है। उसी मकान में किराये पर रहना अधिक किफायती है।
 
BigDecisions द्वारा 2014 के आखिर से शुरू किए गए एक साल से अधिक अवधि के एक सर्वे के दौरान पांच हजार से अधिक यूजर्स की स्‍टडी की गई। देश के सात टॉप शहरों में 60 से 80 फीसदी तक हमारे यूजर्स का मानना है कि निकट भविष्‍य में प्रॉपर्टी की कीमतों में प्रतिवर्ष 10 फीसदी से भी कम का इजाफा होगा। कुछ शहरों में तो बड़ी संख्‍या में लोगों का मानना है कि प्रॉपर्टी कीमतों में माइनस पांच से प्‍लस पांच फीसदी के बीच ही अंतर आ सकता है।
 
 
यह मानकर कि होम लोन की सालाना ब्‍याज दर अधिकांश मामलों में 10 फीसदी या उससे थोड़ी अधिक होती है। चूंकि अधिकांश घरों की फाइनेंशिंग होती है, ऐसे में किसी तैयार प्रॉपर्टी खरीदने के पीछे की फाइनेंशियल लॉजिक समझ से परे है। और वह भी तब जब भविष्‍य में उसकी कीमतों के बढ़ने की इतनी कम संभावनाएं हों। साफ तौर पर घर की खरीद से पहले गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है, खासकर तक जब आप उसी तरह की प्रॉपर्टी को उसकी वैल्‍यू के तीन फीसदी से भी कम पर किराया ले सकते हैं। ऐसे में फाइनेंस मिनिस्‍टर को अब उच्‍च-मध्‍य वर्ग के लिए सोचने के लिए थोड़ा वक्‍त निकालना चाहिए। मध्‍य आय वर्ग पर टैक्‍स का अधिक बोझ लादना समस्‍या का समाधान नहीं हो सकता है।
 
मनीष शाह BigDecisions.com के एमडी और सीईओ हैं।

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