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हरित क्रांति देने वाला आईएआरआई एक्टिंग डायरेक्टर के भरोसे, रिसर्च पर फैसले अटके

नई दिल्‍ली। देश में हरित क्रांति को 50 साल होने जा रहे हैं। वर्ष 1966-67 के रबी सीजन में पहली बार गेहूं की सेमी-ड्वार्फ और अधिक उत्पादकता वाली किस्मों को 2 लाख 40 हजार हैक्टेयर में बोया गया था। इसके साथ देश ने खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए और भारत एक बड़े खाद्यान्न आयातक से एक निर्यातक देश बन गया। इस क्रांति में सबसे अहम भूमिका निभाई दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई) ने।
 
मेक्सिको से आयातित गेहूं से विकसित की नई किस्‍में
 
आईएआरआई के वैज्ञानिकों ने ही मेक्सिको से आयातित गेहूं की किस्मों से कल्याण सोना और सोनालिका किस्में विकसित कीं जो देश में गेहूं उत्पादन में बढ़ोतरी के लि‍हाज से अहम रहीं। गेहूं ही नहीं बाकी फसलों के लिए भी आईएआरआई ने देश के कृषि उत्पादन में अहम भूमिका निभाई है। उसमें बासमती चावल से लेकर कई दूसरी फसलें शामिल हैं और इसके चलते देश के किसानों की आर्थिक स्थिति में भारी बदलाव आया है। लेकिन देश ही नहीं वैश्विक स्तर पर कृषि शोध में अहमियत रखने वाले आईएआरआई को पिछले ढाई साल में छह माह को छोड़कर बाकी समय परमानेंट डायरेक्टर नसीब नहीं हुआ। दो साल से अधिक समय से केवल एक्टिंग डायरेक्टर ही यहां का कामकाज देख रहे हैं। वह भी तब जब यहां के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को चिट्ठी लिखकर स्थिति से अवगत करा चुके हैं।
 
वैज्ञानिक प्रधानमंत्री तक पहुंचा चुके हैं अपनी बात
 
देश को पूसा 1121 बासमती किस्म देने वाले और आईएआरआई से रिटायर्ड एग्रीकल्चर साइंटिस्ट डॉ. वी.पी. सिंह ने moneybhaskar.com के साथ एक लंबी बातचीत में कहा कि वह प्रधानमंत्री को इस बारे में पत्र लिखकर सारी स्थिति बता चुके हैं लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। डॉ. वी. पी. सिंह आईएआरआई की जेनेटिक डिविजन के प्रोग्राम लीडर रहे हैं और देश को करीब 21 हजार करोड़ रुपये का एक्सपोर्ट रेवेन्यू देने वाली पूसा-1121 बासमती किस्म के ब्रीडर हैं।
 
रिचर्स को लेकर सही समय पर नहीं हो पा रहे फैसले
 
राइस ब्रीडर डायरेक्टर नहीं होने के क्या प्रतिकूल प्रभाव होंगे इस सवाल के जवाब में डॉ. वी. पी. सिंह कहते हैं कि इसका इंस्टीट्यूट में शोध कर रहे साइंटिस्ट पर प्रतिकूल असर पड़ना स्वाभाविक है क्योंकि सही समय पर जरूरी फैसले नहीं हो पाते हैं। विजन में क्लेरिटी नहीं रहती है। वह भी देश के ऐसे प्रीमियर इंस्टीट्यूट को लेकर लापरवही बरती जा रही है जिसने हरित क्रांति में योगदान देने के साथ ही देश के किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ ही देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने में सबसे अहम योगदान दिया है। उनका कहना है कि इस मामले में राजनीति खेली जा रही है और जो लोग आईएआरआई के डायरेक्टर की पोजीशन के योग्य हैं उनकी अनदेखी की जा रही है।
 
असल में 7 अगस्त, 2014 को आईएआरआई के डायरेक्टर एच.एस. गुप्ता रिटायर हुए थे। उनके स्थान पर फुल टाइम डायरेक्टर की नियुक्ति करीब एक साल बाद हुई और 28 अगस्त, 2015 को त्रिलोचन महापात्रा को डायरेक्टर नियुक्त किया गया।  इसके पहले महापात्रा ओड़िशा के कटक स्थित सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) के प्रमुख थे। लेकिन 22 फरवरी, 2016 को उन्हें इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) का डायरेक्टर जनरल (डीजी) नियुक्त कर दिया गया। उसके बाद से अभी तक आईएआरआई को डायरेक्टर नहीं मिला है।
डॉ सिंह कहते हैं कि शिप टू माउथ वाले दिनों में सरकार और नेतृत्व को एग्रीकल्चर रिसर्च की अहमियत पता थी और आईएआरआई जैसे संस्थानों को महत्व दिया जाता था लेकिन अब दिन बदल गये हैं। हो सकता है कि हम आत्मनिर्भरता के भ्रम में ऐसा कर रहे हों।

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