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स्‍नैपडील ने की इन 5 जगहों पर चूक, गिर गया बिजनेस, छंटनी की आई नौबत

 
नई दि‍ल्‍ली। भारतीय स्टार्टअप के लिए रोल मॉडल और सॉफ्ट बैंक जैसे इन्वेस्टर की पहली पसंद स्नैपडील इस समय बुरे दौर से गुजर रही है। कंपनी की जहां वैल्युएशन लगातार गिर रही है, वहीं बढ़ते खर्च को संभालने के लिए उसे अब कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ रही है। हालत यह है कि कंपनी को 600 कर्मचारियों को निकालने का फैसला करना पड़ा है, वहीं उनके फाउंडर्स ने भी अपनी सैलरी नहीं लेने का भी ऐलान किया है। यहीं नहीं बिगड़ते हालात को संभालने के लिए उनके फाउंडर्स के समाने अपने कर्मचारियों को ई-मेल लिखकर भरोसा बढ़ाने तक की नौबत आ गई है। देश की तीसरी सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी स्नैपडील के साथ ऐसा क्यों हुआ, वह इस लेवल तक क्यों पहुंच गई, इसके लिए moneybhaskar.com ने ई-कॉमर्स सेक्टर के प्रमुख एक्सपर्ट्स से बातचीत की है। आइए जानते हैं कि कंपनी से कहां पर चूक हुई..
 
1. रेवेन्‍यू कम लेकि‍न खर्च ज्‍यादा
 
टेक्‍नोपैक एडवाइर्स के चेयरमैन अरविंद के सिंघल ने moneybhaskar.com को बताया कि‍ स्‍नैपडील की ओर से काफी ज्‍यादा खर्च कि‍या जा रहा था और वो भी ऐसे वक्‍त पर जब कंपनी का इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत है। फ्लि‍पकार्ट को फंड की फि‍लहाल जरूरत नहीं है, अमेजन के पास फंड की कि‍ल्‍लत नहीं हैं, पेटीएम के पीछे अलीबाबा है। वहीं, स्‍नैपडील के साथ फंड की कमी होने के साथ-साथ हाई कॉस्ट स्‍ट्रक्‍चर की प्रॉबल भी रही है।  
 
ई-कॉमर्स एक्‍सपर्ट अंकुर बेसि‍न ने  moneybhaskar.com को बताया कि‍ स्‍नैपडील का रेवेन्‍यू इन्‍वेस्‍टर्स की उम्‍मीद से काफी कम था वहीं खर्च ज्‍यादा कि‍या जा रहा था। खर्च कम या ज्‍यादा रेनेव्‍यू के हि‍साब से देखा जाता है लेकि‍न स्‍नैपडील के मामले में इन दोनों के बीच का अंतर काफी ज्‍यादा हो गया है। फाइनेंशि‍यल ईयर 2015-16 में स्‍नैपडील का नुकसान 3,316 करोड़ था जबकि‍ उसका रेवेन्‍यू 1,457 करोड़ रुपए था। 
 
ग्रेहाउंड नॉलेज ग्रुप के सीईओ संचि‍त वि‍र गोगि‍या के मुताबि‍क, पि‍छले साल सि‍तंबर-अक्‍टूबर में मार्केटिंग और कैंपेन पर काफी ज्‍यादा खर्च कि‍या वो भी ऐसे वक्‍त पर जब कंपनी को पैसे जुटाना मुश्‍कि‍लों का सामना करना पड़ रहा था।  
 
2. मार्केट के हि‍साब से नहीं बना बि‍जनेस मॉडल
 
सिंघल ने बताया कि‍ भारत के ई-कॉमर्स मार्केट में  काफी संभावनाएं हैं। ई-कॉमर्स काफी हद तक कंज्‍यूमर्स की जरूरतों को पूरा भी कर रहा है। लेकि‍न यहां एक स्‍थि‍र बि‍जनेस मॉडल की भी जरूरत है, जो स्‍नैपडील के अलावा कई दूसरी कंपनि‍यों के पास नहीं है। 
 
अंकुर ने बताया कि‍ भारत में ई-कॉमर्स का मार्केट में काफी नया था। इन्‍वेस्‍टर्स की ओर से भी इसलि‍ए इन्‍वेस्‍ट कि‍या गया। स्‍नैपडील को भी इन्‍वेस्‍टर्स की ओर इसीलि‍ए ज्‍यादा से ज्‍यादा पैसा मि‍ला। हालांकि‍, बीते एक साल के दौरान मार्केट में कॉम्‍पीटि‍शन का स्‍तर बढ़ने लगा लेकि‍न उस हि‍साब से कंपनी का बि‍जनेस मॉडल तैयार नहीं था। स्‍नैपडील के साथ भी ऐसा ही हुआ। कंपनी को अमेजन और फ्लि‍पकार्ट दोनों से कड़ा मुकाबला मिला। यही वजह थी कि‍ स्‍नैपडील दूसरे से तीसरे पायदान पर पहुंच गई।    
 
स्‍नैपडील ने खुद अपने कर्मचारि‍यों को भेजे गए ई-मेल इस बात को मानते हुए कहा कि‍ हाइप पर पैसा नहीं जुटाना चाहि‍ए क्‍योंकि‍ तब आप आप मार्केट की जरूरत के हि‍साब से अनुशासि‍त प्रोडक्‍ट नहीं बना पाते हैं।
 
3. अब नहीं मि‍ल रहा फंड
 
हाई वैल्‍यूएशन के आधार पर भारी मात्रा में पैसा मि‍लने लगा। वहीं, वैल्‍यूएशन कम होने पर पैसा मि‍लना भी बंद हो गया है। अब स्‍नैपडील को भी इसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। कंपनी कम वैल्‍यूएशन पर भी फंड नहीं मि‍ल पा रहा है। जीएमवी की रेस में कंपनी पीछे रह गई है।  बीते एक साल में कंपनी की जीएमवी में 1 अरब डॉलर की गि‍रावट आई है।   
 
4. दूसरी कंपनि‍यों को खरीदने की स्‍ट्रैटजी भी फेल
 
सिंघल ने बताया कि‍ भारत में जब क्रेडि‍ट कार्ड की संख्‍या कम थी तब स्‍नैपडील ने फ्रीचार्ज को खरीदकर मोबाइल पेमेंट में उतर गई। लेकि‍न पेटीएम का वॉलेट सर्वि‍स ने यहां भी उसे पीछे छोड़ दि‍या। अब कंपनी अपनी इस चूक को सुधारने की तैयारी में जुटी है। वि‍भि‍न्‍न रि‍पोर्ट्स के मुताबि‍क, कंपनी फ्रीचार्ज के लि‍ए खरीदार ढूंढ रही है। वहीं, कंपनी ने साल 2013 में हैंडीक्राफ्ट मार्केटप्‍लेस शोपो को खरीदा था जि‍से इस साल फरवरी में बंद कर दि‍या गया। इसके अलावा, कंपनी ने हाई एंड फैशन पोर्टल को खरीदा जि‍से अगस्‍त 2016 में बंद कि‍या गया।
 
5. मार्केट में बढ़ा कॉम्‍पीटि‍शन
 
अंकुर ने बताया कि‍ जब स्‍नैपडील भारत के ई-कॉमर्स मार्केट में आई तो गि‍नी चुनी कंपनि‍यां थी। लेकि‍न बाद में अमेरि‍का की ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन की एंट्री हुई। जीएमवी की रेस में कंपनी बि‍जनेस मॉडल को ठीक से नहीं चला पाई और कस्‍टमर्स दूसरी कंपनि‍यों पर शि‍फ्ट हो गए। वहीं, फ्रीचार्ज के साथ ही ऐसा ही हुआ।
 
जब स्‍नैपडील ने फ्रीचार्ज को खरीदा था तब मार्केट में ज्‍यादा मोबाइल वॉलेट नहीं थे लेकि‍न आज कई कंपनि‍यां मौजूद हैं। स्‍नैपडील ने करीब 45 करोड़ डॉलर में फ्रीचार्ज को अप्रैल 2015 में खरीदा था।
 
एक साल में कई अधि‍कारि‍यों ने छोड़ी कंपनी
 
बीते एक साल में कई सीनि‍यर एक्‍जि‍क्‍युटि‍व्‍स ने स्‍नैपडील को छोड़ दि‍या है। इसमें चीफ प्रोडक्‍ट ऑफि‍सर आनंद चंद्रशेखनर, हेड ऑफ कॉरपोरेट डेवलपमेंट अभि‍षेक कुमार, हेड ऑफ पार्टनरशि‍प एंड स्‍ट्रैटजी इन्‍वेस्‍टमेंट टोनी नवीन और वाइस प्रेसि‍डेंट संदीप कोमारावैली शामि‍ल हैं।
 
आंकड़ों में स्‍नैपडील की हालत
 
बीते 2-3 साल में जुटाया फंड
 
अगस्‍त 2015 : 50 करोड़ डॉलर
फरवरी 2016 : 20 करोड़ डॉलर
अगस्‍त 2016 : 2.1 करोड़ डॉलर
फाइनेंशि‍यल ईयर 2015-16 में नुकसान : 3,316 करोड़ रुपए
नवंबर 2016 में अनबॉक्‍स जिंदगी कैंपेन पर खर्च : 200 करोड़ रुपए

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