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लीन मैन्युफैक्चरिंग से आसान होगा कारोबार, SME को होगा फायदा

लीन मैन्युफैक्चरिंग से आसान होगा कारोबार, SME को होगा फायदा
 
नई दिल्‍ली। लघु और मध्यम उद्योग मैन्युफैक्चरिंग के इंजन हैं। देश की कुल मैन्युफैक्चरिंग में लगभग 40 फीसदी योगदान सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग का है, जो देश की कुल जीडीपी का 8 फीसदी है। मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट में भी लगभग 45 फीसदी योगदान देश के छोटे और मझोले उद्योगों का है, जिनकी संख्या तकरीबन 4 करोड़ है। ये उद्योग 7000 से ज्यादा उत्पाद बनाते हैं, जिनमें कई उत्पाद कॉम्‍पलेक्स मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस से तैयार होते हैं और हाई कैटेगरी में आते हैं। देश निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद एमएसएमई के सामने क्वालिटी, प्रोडक्टिविटी और कम्पटीशन बढ़ाने की चुनौती निरंतर बनी हुई है।
 
टोयोटा ने की थी लीन मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्रोसेस की शुरुआत
 
इस चुनौती का सामना करने के लिए लघु उद्योगों के सामने 'लीन मैन्युफैक्चरिंग' अपनाने का एक कारगर हथियार उपलब्ध है। लीन मैन्युफैक्चरिंग (Lean Manufacturing) का मतलब मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्रक्रिया में 'वेस्ट रिडक्शन', राइट इन्वेंटरी मैनेजमेंट, इफेक्टिव लेआउट प्लान, डिफेक्ट मिनिमाइज़ेशन और बेहतर काम का माहौल बनाकर उच्च गुणवत्तायुक्‍त उत्पाद का कम खर्च में उत्‍पादन करना है। इसकी शुरुआत जापान में टोयोटा कंपनी से हुई थी, जो आगे चलकर पूरे विश्व में 'टी क्यू एम' अथवा 'लीन मैन्युफैक्चरिंग' के नाम से विख्यात हुई। पहले यह मुख्यतः ऑटोमोबाइल कंपनियों में डिफेक्ट रिडक्शन, जस्ट इन टाइम और इन्वेंटरी मैनेजमेंट जैसे सोलूशन्स के लिए लागू की गयी और बाद में इसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में प्रोडक्टिविटी और क्वालिटी के पर्याय के रूप में देखा जाने लगा। कालांतर में धीरे-धीरे इसे सभी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने लगातार बेहतरी के लिए आत्मसात कर लिया। अब सर्विस सेक्टर में भी इसके महत्व को समझा जाने लगा है और मैन्युफैक्चरिंग में अब 'लीन' को 'ग्रीन' ग्रोथ से जोड़कर देखा जाने लगा है।
 
सबसे पहले ऑटोमोबाइल सेक्टर में शुरू हुई लीन मैन्युफैक्चरिंग
 
देश के लघु उद्योगों में 'लीन मैन्युफैक्चरिंग' पहले मुख्यतः ऑटोमोबाइल सेक्टर में बड़े 'ओ ई एम ' के टियर वन और टू के लघु और माध्यम उद्योगों तक ही सीमित था, और ज्यादातर अन्य लघु उद्योग इससे अनभिज्ञ थे। फिर वर्ष 2009 में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय- भारत सरकार ने लघु और माध्यम उद्योगों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के लिए नेशनल कॉम्पिटिटिव मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम की शुरुआत की, जिसमे 'लीन मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिव स्कीम' प्रमुख थी। पायलट फेज में इस स्कीम को 100 मिनी क्लस्टर्स में शुरू किया गया और इस स्कीम ने छोटे और मझोले उद्योगों के लिए 'लीन' अपनाने की दिशा में एक नए आयाम जोड़ दिया। उद्योगों ने 'सिक्स सिग्मा', 'फाइव एस','सेलुलर लेआउट' 'जस्ट इन टाइम' 'काइज़न', 'कानबन' और 'पोकायोके' जैसे क्वालिटी टेक्नोलॉजी टूल की मदद से वेस्ट रिडक्शन, डिफेक्ट रिडक्शन, उचित इन्वेंटरी प्रबंधन और इनोवेशन करके अपनी उत्पादकता को 20-30 फीसदी बढ़ा लिया। साथ ही उनके मैनेजमेंट सिस्टम और कार्य क्षेत्र के माहौल में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला।
 
500 मिनी क्‍लस्‍टर्स में शुरू किया है मिनिस्‍ट्री ने
 
इस कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए मंत्रालय ने अब इस स्कीम को 500 मिनी क्लस्टर्स में वृहद पैमाने पर शुरू किया है। पहले इस स्कीम के कार्यान्वयन में नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल महत्वपूर्ण कड़ी थी, पर अब क्वालिटी काउंसिल ऑफ़ इंडिया को भी लीन मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस स्कीम को इम्प्लीमेंट करने के लिए शामिल किया गया है। हालांकि, अब भी इसे देश में व्यापक और समरस रूप से प्रसारित करने में कई चुनौतियां हैं, फिर भी लघु उद्योग 'लीन मैन्युफैक्चरिंग' के बारे में बढ़ती जानकारी और समझ के कारण कम इन्वेस्टमेंट में इसे स्वयं भी अपना कर अपनी उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ा रहे हैं। इससे आशा है कि न सिर्फ देश में उच्च गुणवत्ता का विनिर्माण होगा, बल्कि इससे देश के 'मैन्युफैक्चरिंग इमेज' को बेहतर करने में भी मदद मिलेगी।
 
टेक्सटाइल एंड गारमेंट समेत कई सेक्‍टर में हैं संभावनाएं इसकी
 
कई इंडस्ट्री सेक्टर जैसे टेक्सटाइल एंड गारमेंट, फाउंड्री एंड फोर्जिंग, ग्लास एंड सिरेमिक्स, जनरल एंड प्रिसिशन इंजीनियरिंग, ऑटो-कम्पोनेंट इत्यादि में जहां लीन मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ एनर्जी एफिशिएंसी बढ़ाने और क्लीन टेक्नोलॉजी इनोवेशन की संभावना है, वहीं इनमें लीन के साथ ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की आवश्यकता और सम्भावनाएं दोनों हैं। कई क्लस्टर्स और इंडस्ट्री एसोसिएशंस इस दिशा में काम भी कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ उद्योगों का मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस इम्प्रूव हो रहा है, बल्कि वे उच्च क्वालिटी के 'लो कार्बन फुटप्रिंट' वाले वर्ल्ड क्लास प्रोडक्ट बना सकने की दिशा में अग्रसर भी हो रहे हैं । लीन मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी एफिशिएंसी इनोवेशंस के इस होलिस्टिक एप्रोच से जीरो डिफेक्ट -जीरो डिफेक्ट मैन्युफैक्चरिंग का भी इकोसिस्टम मजबूत होगा, जिसके सकारात्मक दूरगामी परिणाम होंगे।
 
जरूरी है कुशल लीन व एनर्जी कंसल्टेंट्स की उपलब्ध्ता की
 
इन परिस्थितियों में जरूरत है ज्यादा और कुशल लीन और एनर्जी कंसल्टेंट्स की उपलब्ध्ता की। साथ ही लीन मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी एफिशिएंसी की दिशा में कार्य करने वाले सरकारी, गैर सरकारी संस्‍थाओं और स्टेकहोल्डर्स को साथ आने और काम करने की। अच्छी बात यह है की इस दिशा में कई बिज़नेस मेंबर आर्गेनाइजेशन और औद्योगिक संघ बहुत सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जैसा कि कई स्थानों पर आ रहे आशानुरूप परिणामों से परिलक्षित होता है।
 
लेखक सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार में संयुक्‍त विकास आयुक्‍त के पद पर कार्यरत हैं। उनके ये विचार व्‍यक्‍तिगत हैं। ईमेल– rameshpandeyifs@gmail.com.

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