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‘नोट बैन’ की अधूरी तैयारी इकोनॉमी पर पड़ेगी भारी, मैन्युफैक्चरिंग पर पड़ने लगा असर

‘नोट बैन’ की अधूरी तैयारी इकोनॉमी पर पड़ेगी भारी, मैन्युफैक्चरिंग पर पड़ने लगा असर
 
नई दिल्ली.आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संदेश के जरिये 500 और एक हजार रुपए के नोट प्रतिबंधित कर दिए थे। इस फैसले को करीब एक सप्ताह गुजर गया है। इसके बाद से कैश बदलने में लॉजिस्टिक सिस्टम धराशायी हो गया, जिससे सरकार को एटीएम, कैश बिदड्राल लिमिट और पुराने नोटों के उपयोग की जगहों के लिए समयसीमा बढ़ाने जैसी घोषणाएं करनी पड़ी हैं। इससे साफ है कि सरकार को इस फैसले के असर पूरा अनुमान नहीं था और इसके चलते वह पूरी तैयारी नहीं कर सकी। इस फैसले का इकोनॉमी में डिमांड पर सीधा असर पड़ा है और चालू तिमाही में इकोनॉमी की ग्रोथ पर इसका नकारात्मक असर दिखना तय है। लेकिन सबसे बड़ा असर उत्पादन और खासतौर से इनफॉर्मल सेक्टर पर दिखने वाला है और उसकी भरपाई की संभावना भी न के बराबर है। देश की 80 फीसदी आबादी को रोजगार मुहैया कराने वाले इस सेक्टर की जीडीपी में 45 फीसदी हिस्सेदारी है जो इस नकदी संकट का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतने जा रहा है।
 
 
नहीं सुधरेगी आरबीआई की बैलेंसशीट
 
असल में देश में करीब 17 लाख करोड़ रुपए की करेंसी के सर्कुलेशन में 500 और एक हजार रुपए के नोट की हिस्सेदारी 86 फीसदी है। बाकी करेंसी की हिस्सेदारी मात्र 14 फीसदी है। इस करेंसी के बंद होने का ब्लैक मनी पर कितना असर पड़ेगा, इसका पता 31 मार्च, 2017 के बाद ही चलेगा जब इसे बदलने की समयसीमा समाप्त हो जाएगी। हालांकि कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि इससे भारतीय रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट सुधरेगी और उसे जो फायदा होगा उसे वह सरकार को स्पेशल डिविडेंड के रूप में दे सकता है जिससे सरकार की फिस्कल पोजिशन ठीक होगी और इससे सरकार लोक कल्याण योजनाओं पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकेगी। लेकिन एक इंटरव्यू में रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर सी. रंगराजन ने इस तरह के डिविडेंड की किसी भी संभावना को पूरी तरह नकार दिया है। उनका कहना है कि इससे आरबीआई की लायबिलिटी कम होगी और उसे एसेट के साथ एजस्ट कर दिया जाएगा और यह केवल एक बैलेंस शीट एंट्री होगी, उसके अलावा कुछ नहीं।
 
इनफॉर्मल सेक्टर को लगेगा झटका
 
वहीं इकोनॉमिस्ट प्रणब सेन का कहना है कि नोट बंद करने के इस फैसले का सबसे अधिक असर इनफॉर्मल सेक्टर पर पड़ेगा और इस झटके से उसका पूरी तरह उबरना संभव नहीं है। यही नहीं 12वीं योजना के आकलन का हलावा देते हुए वह कहते हैं कि देश में इनफॉर्मल फाइनेंशियल सेक्टर बैंकिंग क्रेडिट के 40 फीसदी के बराबर है, जो जीडीपी का 26 फीसदी है। सरकार के इस कदम से यह पूरी तरह चरमरा जाएगा। इसका सीधा असर इकोनॉमी को झेलना होगा।
 
कैश किल्लत से घटी कंजमप्शन, उधार पर चल रहा काम
 
पिछले एक सप्ताह से लोगों को कैश की किल्लत की वजह से सारा फोकस कंजमप्शन में कमी पर रहा है लेकिन कैश की किल्लत के बावजूद थोड़ा बहुत काम उधारी से कम चल रहा है। लेकिन टर्शरी और छोटे उद्योगों में मजदूरों को पैसे के भुगतान का संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने करंट अकाउंट में सप्ताह भर में विदड्राल की सीमा को शुरू के 20 हजार रुपए से बढ़ाकर सोमवार से 50 हजार रुपए किया है, लेकिन छोटी से छोटी यूनिट में भी सप्ताह भर की मजदूरी खासतौर से कैजुअल लेबर के लिए दो से ढाई लाख रुपए होती है। नतीजा गारमेंट मैन्यूफैक्चरिंग से लेकर तमाम छोटे धंधों में उत्पादन बंद होने वाला है। हालांकि कारोबारी चाहेगा कि वह इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर के जरिये यह भुगतान करे। लेकिन इस पर एक मझौले गारमेंट मैन्यूफैक्चरर का कहना है कि इसके लिए पहले खाते खोलने होंगे और उनको लिंक भी करना होगा। यही संकट दुग्ध कलेक्शन डेयरियों के सामने आना शुरू हो गया है। गांव-गांव में साप्ताहिक पेमेंट की व्यवस्था है और वह कैश से होता है लेकिन अब कैश है ही नहीं। नतीजा किसानों से दूध की खरीदारी घटेगी।
 
 
 

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