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Warren Buffett
निवेश की दुनिया में भव‍िष्‍य के बजाय अतीत को देखना ज्‍यादा बड़ी समझदारी है।

कब मिलेगी अफोर्डेबल हाउसिंग को तवज्जो

मधुरेन्द्र सिन्हा लेखक वरिष्ठ पत्रकार | Feb 19, 2013, 00:17AM IST
कब मिलेगी अफोर्डेबल हाउसिंग को तवज्जो

आर्थिक सुधारों के बाद देश में जो समृद्धि आई वह महानगरों की ओर लोगों को गांवों और छोटे शहरों से खींचकर ले तो आई लेकिन वहां उनके सामने एक ऐसी समस्या खड़ी थी, जिसका निदान न उनके पास था और न सरकार के पास। और यही वज़ह है कि आज देश में पौने दो करोड़ लोग ढंग के एक छत की प्रतीक्षा में खड़े हैं।

वे झोपड़पट्टियों और अवैध बस्तियों में रहने को अभिशप्त है जहां पीने का साफ पानी तो छोड़ दीजिए किसी तरह की बुनियादी सुविधा भी नहीं है।

उन बस्तियों में लाखों लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं और वह भी इसलिए कि सरकार उनके लिए एक मूलभूत सुविधा जुटाने में असफल रही है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर कभी गंभीरता से कदम उठाने की ज़हमत नहीं उठाई गई। दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने की दिशा में कोशिश करते समय हम यह भूल जाते हैं कि इसी दुनिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी हमारे ही देश में है।

हमारी आर्थिक तेजी शहरों तक ही सीमित रह गई है, जिससे वहां गांवों और कस्बों से बड़े पैमाने पर लोगों का रोजगार के लिए पलायन हो रहा है। पलायन की दर इतनी तेज है कि इसका समाधान फिलहाल दिख नहीं रहा है और बड़े शहरों की नागरिक सुविधाओं पर इतना दबाव बढ़ गया है कि वे चरमरा रही हैं।  

लेकिन अब पिछले कुछ समय से इस पर राष्ट्रव्यापी बहस हो रही है और शायद केंद्र सरकार के रुख में बदलाव भी आता दिख रहा है और वह सस्ते मकानों के बारे में सोचती दिख रही है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है क्योंकि जमीन राज्य सरकारों का विषय है और केन्द्र सरकार महज टैक्स में छूट या ऐसे मकानों के लिए सस्ती दरों पर कर्ज की व्यवस्था करवा सकती है।

अगर आंकड़ों की ओर देखें तो इस समय तुरंत पौने दो करोड़ सस्ते मकानों की जरूरत है, जबकि इसका दस फीसदी ही बन रहे हैं। प्राइवेट बिल्डर लक्जरी मकान बनाने में ही दिलचस्पी ले रहे हैं क्योंकि इसमें कमाई ज्यादा है और माथापच्ची भी कम।

उनका कहना है कि सस्ते मकान बनाने के लिए शहरों में जमीन चाहिए जिनके दाम इतने बढ़ गए हैं कि वहां ये किसी तरह से बन नहीं सकते हैं। इसके अलावा प्रशासनिक दांवपेंच भी बहुत हैं। सबसे बड़ी समस्या योजनाओं की मंजूरी में आती है जिससे न केवल कीमती वक्त बर्बाद होता है बल्कि धन भी जाया होता है जिससे मकानों की लागत भी बढ़ जाती है।

हालत यह है कि प्राइवेट बिल्डरों को मकान के लिए जमीन लेने से लेकर काम शुरू करने की मंजूरी लेने तक कम से कम पचास तरह की बाधाएं पार करनी होती हैं, जिससे वे सस्ते मकानों की परियोजनाओं से दूर रहते हैं। उधर राज्यों के आवास बोर्ड या विकास प्राधिकरण सरकारी जमीन की नीलामी करके मोटी कमाई कर रहे हैं और यही कारण है कि वहां सस्ते मकान बन नहीं पा रहे हैं।

सस्ते मकान से तात्पर्य 300 वर्ग गज के मकानों से है जिनके लिए किसी भी को अपनी आय का 30 से 40 प्रतिशत तक देना होता है। कम आय वर्ग के लोगों की समस्या है कि उनके पास धन जुटाने के साधन बेहद कम है। उन्हें आसानी से ऋण भी नहीं मिलता और वे ज्यादा ब्याज भी दे नहीं सकते।

ऐसे में सरकार के सामने दो ही विकल्प हैं। एक तो यह कि वह कम दाम में शहरों में मकान बनाने के लिए जमीन मुहैया कराये या फिर उपनगरों को बसाये ताकि मुख्य शहर जहां कारखाने या रोजगार के केन्द्र हैं, दबावमुक्त रहें। सेटेलाइट सिटी दरअसल बड़े शहरों को न केवल जनसंख्या के दबाव से बचाये रखने में सफल होते है बल्कि जीवन-यापन को बढिय़ा रखने में भी मददगार।

अगर कम दाम की बात की जाए तो राज्य सरकारों को खुद सस्ते मकान बनाने के लालच से बाहर निकलना होगा। उनके पास न तो पर्याप्त धन हैं और न ही संसाधन। इसके लिए उन्हें प्राइवेट बिल्डरों का सहारा लेना ही होगा क्योंकि पीपीपी मॉडल ही इस विशाल समस्या के समाधान में सहायक हो सकता है।

सरकार को उन्हें शर्तों के साथ कम दाम में ज़मीन देनी होगी ताकि वे उस पर सस्ते मकान जल्दी बना सकें क्योंकि इनमें जितनी देरी होती है उससे उनके दांम उतने ही बढ़ जाते हैं। आज भारत के प्राइवेट बिल्डर विश्व स्तर के मकान बना रहे हैं। उनके पास पर्याप्त संसाधनों के अलावा नई टेक्नोलॉजी भी है।

दूसरा तरीका है मुख्य शहरों से सेटेलाइट सिटी बनाने का जिसे इंग्लैंड और हाल में चीन ने अपनाया है। इससे उन शहरों को अनावश्यक भीड़ से बचाया जा सकता है और मकानों की लागत भी घटाई जा सकती है। इसके लिए सरकार के कई अंगों को एक साथ मिलजुलकर काम करना पड़ता है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है समुचित परिवहन व्यवस्था का विकास। काम की जगह पर जाने के लिए तीव्र परिवहन समय की जरूरत है।

इससे लोग मुख्य शहरों में रहने की बजाय दूर दराज के शहरों में रहना पसंद करेंगे जहां बेहतर सुविधाएं तो होंगी ही, कीमतें भी कम होंगी। उपनगरों का विकास इसलिए भी जरूरी है कि आखिर किसी शहर के फैलने की भी कोई सीमा होती है।

इनसे विकास के केन्द्र भी बढ़ते जाते हैं और समृद्धि महज एक या दो शहरों तक सीमित नहीं रह जाती है। नए बस रहे शहरों को तो पहले से ही वैज्ञानिक ढंग से आवासीय कॉलोनियां बनाने के लिए भूमि का आवंटन करना चाहिए और वह भी दूरगामी सोच के साथ ताकि लंबे वक्त तक वहां भीड़भाड़ न हो। चंडीगढ़ इस मामले में एक बड़ी मिसाल है।

इस मामले में केन्द्र सरकार की भूमिका यह हो सकती है कि वह इस सेक्टर को इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दे, जिससे बिल्डरों को धन जुटाने में आसानी हो। इस समय सस्ते मकान बनाने की दिशा में यह सबसे बड़ी बाधा है। कच्चे माल यानी सीमेंट, ईंट, छड़ों के सामानों के दाम भी आसमान छू रहे हैं और इनसे उनकी लागत बढ़ी है।

अगर बिल्डरों या डेवलपरों को आसान शर्तों पर कर्ज मिलता है और कुल लागत कम होगा तो वे इसका फायदा लोगों को भी दे सकते हैं। लेकिन इसके लिए सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत है। सरकार की मदद और दृढ़ इच्छा शक्ति के बगैर कुछ नहीं हो सकता है।

दुनिया के सबसे समृद्ध देश अमेरिका में भी गरीबों के लिए सस्ते मकानों का प्रावधान है। कैलिफोर्निया ऐसा प्रांत है जहां कमजोर वर्ग के लोगों के लिए सस्ते मकानों के लिए बाकायदा कानून है। मलेशिया में भी सस्ते मकान बनाने के लिए वहां की सरकार ने पीपीपी मॉडल अपनाया है और उसे सफलता भी मिली है।

सिंगापुर और हांगकांग जहां ज़मीन की भारी कमी है, वहां सरकार ने बड़े पैमाने पर बहुमंजिली इमारतें बनाने की अनुमति देकर स्थिति को संभाला है। ज़ाहिर है कि हम भी ऐसा कर सकते हैं और करना भी चाहिए।

मधुरेन्द्र सिन्हा
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। भारत में अफोर्डेबल हाउसिंग की अड़चनों को बयां करता उनका लेख।

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