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मुनाफा तब तक एक भ्रम है जब तक वह नगद में नहीं दिखाई देता।
सरकार को जरूरत ही नहीं रह गई लघु बचत की

बदलाव
: छत्तीसगढ़ में सरकार को लघु बचत की जरूरत नहीं
: खनन व उद्योगों से मिल रहा है भरपूर राजस्व
: सरकार ने लघु बचत योजनाओं के प्रति कोई ध्यान नहीं दिया
: कमीशन घटने से एजेंटों की भी दिलचस्पी घट गई
: लोकप्रिय योजनाएं बंद होने से भी निवेशक छिटके

नेशनल सेविंग स्कीम को लेकर छत्तीसगढ़ में न तो आम लोगों में उत्साह बचा है, और न ही राज्य सरकार में। लगातार उपेक्षा झेल रही छोटी बचत योजनाओं का हाल छत्तीसगढ़ में बेहद खराब है। हर साल बचत की राशि में भारी गिरावट देखी जा रही है। वहीं, खनन और उद्योगों की ओर से भारी भरकम राजस्व प्राप्त होने के चलते सरकार भी इस ओर कोई खास ध्यान नहीं दे रही है।


छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय बचत योजना के अपर संचालक ए. सी. द्विवेदी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि केंद्र सरकार द्वारा पिछले कुछ सालों में किए गए नीतिगत बदलावों का असर लघु बचत स्कीमों पर पड़ा है। राष्ट्रीय बचत पर सबसे विपरीत प्रभाव किसान विकास पत्र (केवीसी) के बंद होने के बाद से पड़ा है। किसान विकास पत्र राष्ट्रीय बचत की एक महत्वाकांक्षी स्कीम थी और यह ग्राहकों को बांधे रखती थी।


दिसंबर 2011 से सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया। इसके बंद होते ही इस स्कीम में होने वाला डिपॉजिट एकाएक थम गया। इस स्कीम में डिपॉजिट दूसरी स्कीमों से कहीं अधिक था।
इस योजना के बंद होने के बाद से डिपॉजिट और निकासी के अंतर को पाटने में काफी कठिनाई आ रही है। चूंकि इसका सीधा असर राज्य सरकार को मिलने वाले कम लागत के फंड की प्राप्ति पर भी पड़ता है।


ऐसे में यह राज्य सरकार के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है कि वह लघ ुबचतों को और भी आकर्षित बनाने का प्रयास करे। लेकिन सरकार की ओर से अभी इस ओर कोई भी दिशानिर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। इसका एक महत्वपूर्ण कारण राज्य के पास आय के दूसरे बड़े स्रोत जैसे खनन रॉयल्टी, उद्योगों से मिलने वाले भारी भरकम टैक्स हैं। जिसके कारण सरकार केंद्रीय फंड पाने के लिए लघु बचत के प्रोत्साहन जैसे दूसरे कदम भी नहंीं उठा रही है।


लघु बचतों को बढ़ाने के लिए विभाग की ओर से कई बार राज्य सरकार से एजेंटों का कमीशन बढ़ाने और उत्साह बढ़ाने वाली योजनाओं की मांग की जा रही है। लेकिन अभी तक किसी भी बेहतर परिणाम के संकेत नहीं मिले हैं।
रायपुर जिले के बचत अधिकारी कमलेश लाल ने बताया कि पिछले साल के मुकाबले बचत की राशि गिरकर आधे से भी कम हो गई है। पिछले साल रायपुर जिले में लघुबचतों के माध्यम से 570,04,12,030 रुपये का कुल डिपॉजिट प्राप्त हुआ था।


जिसमें से 543,62,99,486 रुपये की निकासी की गई। इस प्रकार वर्ष 2011-12 में रायपुर जिले का कुल डिपॉजिट 26,41,12,544 रुपये रहा। वहीं इस साल नवंबर महीने तक राज्य का कुल डिपॉजिट घटकर सिर्फ 7,63,88,351 रुपये रह गया। इस दौरान जिले में लघु बचतों के माध्यम से 362,78,19,411 रुपये का कुल डिपॉजिट प्राप्त हुआ था।


जिसमें से 355,14,31,060 रुपये का आहरण किया गया। लाल के अनुसार यदि शेष 5 माह में अच्छे डिपॉजिट की उम्मीद की जाए तो भी करीब 7 से 10 करोड़ रुपये की गिरावट आने की पूरी संभावना है। उन्होंने बताया कि राज्य में बचत योजनाओं की इतनी खराब स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण एजेंटों के कमीशन में की गई 50 फीसदी कमी है। पूर्व के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 60 से 70 फीसदी लघु बचतों का डिपॉजिट एजेंटों के माध्यम से प्राप्त होता है।


लेकिन दस साल से एजेंट कमीशन में कमी होने से बहुत से एजेंट लघु बचतों से दूर चले गए हैं। साथ ही पोस्ट ऑफिस कर्मचारियों द्वारा भी न तो एजेंट और नहीं ग्राहकों को अपने साथ जोडऩे की कोई कोशिश की जा रही है। वहीं केंद्र सरकार द्वारा शेयर मार्केट और दूसरी बचत योजनाओं के लिए आकर्षक योजनाएं शुरू करने के कारण नौकरीपेशा ग्राहक भी इससे दूर होते जा रहे हैं।

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