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निवेश की दुनिया में भव‍िष्‍य के बजाय अतीत को देखना ज्‍यादा बड़ी समझदारी है।

इतने असहिष्णु न बनिए जनाब, आप जनप्रतिनिधि हैं

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली | Jan 26, 2013, 01:08AM IST
इतने असहिष्णु न बनिए जनाब, आप जनप्रतिनिधि हैं

राजनीतिक नेताओं में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। जब-तब वे धमकियां देते नजर आ जाते हैं। अच्छा होगा अगर वे इस गणतंत्र दिवस के मौके पर सौम्य व्यवहार बरतने का संकल्प लें

संसद में देश के सबसे बड़े विपक्षी दल का दर्जा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष पद से हटते ही नितिन गडकरी ने 'आजादी' का जो अहसास दिलाया है वह गौर करने लायक है। भाजपा ही क्यों, सत्तारूढ़ गठबंधन यूपीए की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता भी इस तरह की आजादी का अहसास दिला चुके हैं।

याद कीजिए विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का वह बयान जो उन्होंने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के खिलाफ दिया था। खुर्शीद ने खुलेआम धमकी दी थी कि अगर केजरीवाल उनके चुनावी क्षेत्र में गए तो वापस नहीं लौट पाएंगे।

नेताओं द्वारा ऐसा रवैया अपनाए जाने के और भी मामले मिल जाएंगे, लेकिन गडकरी की खुलेआम धमकी विशेष अर्थ रखती है। यहां गौर करने वाली बात है कि पूर्व भाजपा अध्यक्ष ने किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ आरोप नहीं लगाए। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप के हम आदी हैं।

गडकरी ने सीधे-सीधे सिस्टम को धमकी दी है। सिस्टम में खामियां हो सकती हैं, लेकिन आयकर अधिकारियों से खुलेआम यह कहना कि भाजपा सत्ता में आएगी तब उन अधिकारियों को सोनिया गांधी और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम भी नहीं बचा पाएंगे, बेहद आपत्तिजनक है।

भाजपा एनडीए गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी है और 2014 के आम चुनावों में सत्ता पर काबिज होने का दावा भी कर रही है। गडकरी ने यह धमकी उन आयकर अधिकारियों को दी है जो उनसे सीधा वास्ता रखने वाले पूर्ति ग्रुप में हुई संदिग्ध फंडिंग की जांच कर रहे हैं।

खासकर 22 जनवरी को पड़े आयकर छापों के चलते ही गडकरी लगातार दूसरी बार भाजपा अध्यक्ष बनने का अपना सपना साकार नहीं कर पाए। दरअसल ज्यादातर नेताओं के कहीं न कहीं अपने बिजनेस हैं, अपने सरोकार हैं। उनके लिए 'पावर' का दुरुपयोग भी कोई नई बात नहीं है। एक के बाद एक खुलते घोटालों से यह बात साबित भी होती है।

अगर वह पाक साफ हैं तो उन्हें जांच में सहयोग कर खुद को यह साबित करना चाहिए न कि इस तरह जांच को प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। चाहे वे गडकरी हों, कांग्रेस के सलमान खुर्शीद हों या कोई और नेता, यह बात सब पर लागू होती है।

मौजूदा यूपीए सरकार पर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तथा बसपा सुप्रीमो मायावती को ब्लैकमेल करने के लिए सीबीआई के इस्तेमाल के आरोप भी लगते रहे हैं।

इन आरोपों में सच्चाई चाहे जितनी हो, यह बात जरूर सच है कि इनसे सरकारी एजेंसियों में काम करने वालों के मनोबल को आघात पहुंचता है और आम लोगों के मन में भी इन एजेंसियों के प्रति भ्रांतियां पैदा होती हैं। एक और अहम बात यह है कि नेताओं का यह असहिष्णु रवैया बेहद खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करता है।

नेता 'पब्लिक फिगर' तो बनना चाहते हैं लेकिन पब्लिक के बीच रहने की सहिष्णुता वे नहीं रखते। सार्वजनिक जीवन जीने वाली किसी भी शख्सीयत के लिए यह जरूरी होता है कि कम से कम जनता के सामने वे सौम्य व्यवहार दिखाएं। इस गणतंत्र दिवस पर वे कम से कम यह संकल्प तो लें।

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संसद में देश के सबसे बड़े विपक्षी दल का दर्जा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष पद से हटते ही नितिन गडकरी ने 'आजादी' का जो अहसास दिलाया है

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