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निवेश कोई खेल नहीं,जहां कोई बलवान किसी कमजोर को हरा दे
भारतीय शेयर बाजारों में शॉर्ट टर्म निवेश का बेहतरीन समय

विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय बाजारों में शॉर्ट टर्म निवेश के लिए यह बेहतरीन समय है। इसकी वजह यह है कि प्राइस-अर्निंग अनुपात (पीई) के लिहाज से बीएसई सेंसेक्स व एनएसई निफ्टी अभी भी वर्ष 2007 के आखिर व वर्ष 2008 के अपने उच्च स्तरों से काफी नीचे है।


साथ ही, घरेलू अर्थव्यवस्था की रफ्तार जितनी कम होनी थी, उतनी हो चुकी है और सरकार भी अब सुधारों पर खासा ध्यान दे रही है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक वर्ष 2013 में मौद्रिक नीति को आसान बनाने का काम शुरू करने जा रहा है और रुपया भी अपने सबसे निचले स्तरों से 5.5 फीसदी ही दूर है।


बाजारों में रहेगी बढ़त
घरेलू बाजारों में भारी निवेश कर रहे विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) का मानना है कि सेंसेक्स व निफ्टी, बांड यील्ड और रुपये के मौजूदा स्तरों के हिसाब से यहां जोखिम एवं रिटर्न के बीच मामला सकारात्मक दिखाई दे रहा है। निवेशकों का मानना है कि सेंसेक्स व निफ्टी यहां से 10 फीसदी तक ऊपर जा सकते हैं। साथ ही, 10 साल की अवधि वाले बैंचमार्क सरकारी बांड की यील्ड में कम से कम 0.50 फीसदी की गिरावट आने की संभावना है।


पीई अनुपात अभी भी कम
सेंसेक्स व निफ्टी पर पीई अनुपात फिलहाल वित्त वर्ष 2012-13 की आय का 17 गुना है। वर्ष 2007 के आखिर में यह 25 गुना के स्तर पर था। अब तक कंपनियों के वित्तीय नतीजों में आय में ग्रोथ का स्तर 10-12 फीसदी पर रहा है और इसके यहां से नीचे जाने की कोई संभावना नहीं दिखती। इसके चलते, आने वाले दिनों में कंपनियों की आय में बेहतर ग्रोथ होनी तय है और इसी वजह से मौजूदा पीई अनुपात के मद्देनजर दोनों सूचकांकों में खासी बढ़त देखी जा रही है।


जीडीपी में आगे और ग्रोथ
कंपनियों की आय की तरह ही देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ग्रोथ का स्तर भी जितना नीचे आना था, पहले ही आ चुका है। वित्त वर्ष 2012-13 की दूसरी तिमाही के दौरान जीडीपी ग्रोथ तीन साल के निचले स्तर 5.3 फीसदी पर आ गई। जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में ब्याज दरों में गिरावट, आर्थिक सुधारों के लागू होने और बेस स्तर कम रहने के चलते वित्त वर्ष 2012-13 की दूसरी छमाही के दौरान जीडीपी ग्रोथ में बढ़ोतरी होने की पूरी उम्मीद है।


ब्याज दरें घटने की उम्मीद
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी अक्टूबर माह के दौरान जारी अपनी मौद्रिक नीति में संकेत दिए थे कि यह जनवरी, 2013 से ब्याज दरों में कटौती शुरू कर सकता है।


जनवरी माह के दौरान होने वाली अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा में रिजर्व बैंक को कमजोर जीडीपी आंकड़ों का ध्यान भी निश्चित तौर पर रखना होगा। हालांकि, कुछ लोग दिसंबर माह में होने वाली रिजर्व बैंक की बैठक में भी ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे हैं। पूंजी बाजारों में आम धारणा है कि वर्ष 2013 में ब्याज दरें मौजूदा स्तरों से कम रहेंगी और इसी वजह से बांड व इक्विटी में निवेश को लेकर धारणा में लगातार सुधार हो रहा है।


सरकारी सुधारों से आस
मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रस्ताव को पारित कराने के लिए सरकार संसद के चालू शीतकालीन सत्र के दौरान पूरा जोर लगा रही है। अभी तक इस मामले में सकारात्मक संकेत ही मिल रहे हैं। साथ ही, सरकार ने एविएशन, बीमा व पेंशन सेक्टर को भी एफडीआई के लिए खोल दिया है।मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई को संसद की हरी झंडी मिलते ही राजनैतिक मोर्चे पर सरकार को बड़ी जीत हासिल होगी और इससे निवेशकों के बीच सरकार की सुधारवादी छवि और मजबूत होगी।


रुपये में मजबूती संभव
मुद्रा बाजार में रुपया फिलहाल डॉलर की तुलना में 55 के आसपास चल रहा है। अपने अब तक के सबसे निचले स्तरों से रुपया अभी भी पांच फीसदी दूर है। उधर, सरकार ने देश में विदेशी पूंजी की आवक को बढ़ाने के लिए पूरा जोर लगा रखा है और इससे आने वाले दिनों में रुपये के मजबूत होने की खासी संभावना है।


एफआईआई का भारी निवेश
एफआईआई वर्ष 2012 की अब तक की अवधि में भारतीय शेयर बाजारों में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का शुद्ध निवेश कर चुके हैं। बाजारों के मौजूदा सकारात्मक आउटलुक के मद्देनजर एफआईआई की आवक में और बढ़ोतरी होने की संभावना है।


लंबी अवधि में हैं जोखिम
लंबी अवधि के लिहाज से भारतीय बाजारों में कई तरह के जोखिम हैं। राजकोषीय स्थिति में सुधार के लिए ढांचागत स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुए हैं। पिछले एक दशक से जीडीपी व टैक्स का अनुपात 10 फीसदी के स्तर पर ही अटका हुआ है। साथ ही, जीडीपी व सब्सिडी का अनुपात भी दो फीसदी के स्तर पर ही टिका हुआ है।


फ्यूल के दामों को पूरी तरह नियंत्रण मुक्त नहीं किया गया है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड का भाव 110 डॉलर से ऊपर की तरफ चढ़ता है तो सरकार की मुश्किल खासी बढ़ सकती है। इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में देश बहुत पीछे है और रेलवे व एविएशन जैसे सेक्टर लगातार घाटे में चल रहे हैं।


यह सही है कि भारत विदेशी पूंजी की आवक बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रहा है, लेकिन किसी तरह के बाहरी संकट के समय इस पूंजी के गायब हो जाने का जोखिम भी इससे बढ़ रहा है। चालू खाता घाटे की समस्या का कोई स्थायी हल न निकलने तक रुपये में उठापटक भी बनी ही रहेगी। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि भारत में शॉर्ट टर्म के लिहाज से निवेश करें, लेकिन सही समय आते ही बिकवाली भी करें।

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