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Peter Drucker
मुनाफा किसी कंपनी के लिए उसी तरह है जैसे एक व्यक्ति के लिए ऑक्सीजन।
रतन टाटा ने पौने पांच लाख करोड़ के साम्राज्य के साथ साइरस को दी तीन सलाह
143 साल पुरानी कंपनी टाटा एंड संस शुक्रवार से साइरस मिस्त्री के हाथों में होगी। अपने 75वें जन्मदिवस के मौके पर रतन टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा एंड संस के चेयरमैन का पद 44 साल के साइरस मिस्त्री को सौंपेंगे। ऐसा नाम जिसके आखिर मे टाटा नहीं लिखा होगा। (जानें टाटा से जुड़ी 75 सुनी-अनसुनी बातें)
 
यह बदलाव टाटा संस के बोर्ड रूम में सिर्फ नेम प्लेट बदलने तक सीमित नहीं होगा। असर कहीं आगे तक होगा। रतन टाटा जो समूह साइरस को सौंप रहे हैं वह 1991 में उन्हें जेआरडी से मिली थाती से कहीं अलग है। 21 साल में रतन ने समूह का बाजार मूल्य 33 गुना तक बढ़ा दिया। करीब पौने पांच लाख करोड़ रुपए। इस दौरान समूह की बिक्री 43 गुना बढ़ी जबकि मुनाफे में 51 गुना बढ़ोत्तरी हुई। किसी भी उत्तराधिकारी के लिए कंपनी की ऐसी तरक्की बनाए रखना मुश्किल काम होगा। (टाटा का बेडरूम से लेकर बाथरूम तक सब कुछ है खास)
 
क्या साइरस समूह को रतन के जैसे ही नई ऊंचाइयों पर पहुंचा पाएंगे? इसका जवाब है- शुरुआती कुछ वर्षों में मिस्त्री को रतन से नियमित सलाह लेनी होगी। हालांकि व्यवस्था यह की गई है कि रतन और साइरस दो हफ्ते में कम से कम एक बार लंच या ऐसे ही किसी और मौकों के बहाने मिलेंगे। टाटा ने मिस्त्री को तीन सलाह दी है। ये वही सलाह हैं जो जेआरडी ने रतन को कंपनी के चेयरमैन बनने के वक्त दी थी- 
 
पहली : आपको क्या चाहिए ये आपको तय करना है। इसके लिए फैसले भी आपको खुद लेने होंगे। 
 
दूसरी : इस बात का ध्यान रखें कि आपकी हर गतिविधि पर लोगों की नजर होगी और वे उसे परखेंगे। जो बात लोगों की जांच-पड़ताल में खरी उतरे वहीं करें। जो खरा न उतरे उसे नहीं करें। 
 
तीसरी : भले ही मैं कुछ समय तक अपके साथ हूं, लेकिन आपको यह मानकर चलना चाहिए कि यदि मैं वहां नहीं होता तो आप क्या करते। मैं नहीं चाहता कि आपके ऊपर साये की तरह मंडराता रहूं। 
 
टाटा की इन सलाहों के पीछे कुछ खास वजहें हैं। जेआरडी से बागडोर लेते समय की चुनौतियां आज के लिहाज में पूरी तरह अलग थी। मिस्त्री के सामने बिल्कुल अलग चुनौतियां होंगी। रतन टाटा ने २१ वर्षों में कंपनी को एक इकाई में तब्दील किया। जो खास पहचान बनी। इस उपलब्धि को शायद कोई और हासिल नहीं कर पाता। जेआरडी अपनी शख्सियत के बूते समूह को एक रखने में कामयाब हुए थे। 
 
उस वक्त समूह की कंपनियों में टाटा की महज २० से ३० फीसदी हिस्सेदारी होती थी। १९९१ में जेआरडी किसी को भी समूह का चेयरमैन चुन सकते थे। रूसी मोदी, दरबारी सेठ, सुमंत मूलगांवकर, अजित केरकर और एएच टोबैकोवाला जैसे लोग कतार में थे। कंपनी में इन सभी की अहमियत रतन टाटा से कहीं अधिक थी। चेयरमैन बनने के वक्त उन्होंने ऐसा कुछ खास करके भी नहीं दिखाया था। हालांकि, नेलको जैसे छोटी कंपनी को रिवाइव करने में मदद की थी। साथ ही टाटा इंडस्ट्रीज के लिए कुछ सुझाव लेकर आए थे। 
 
तो फिर जेआरडी ने रतन को ही क्यों चुना? संभवत: दो वजहों से। पहली, नाम के पीछे टाटा लगा होना। दूसरी, रतन के पास विचारों की साफगोई है। वह मुश्किल समय में समूह को एक बनाए रखने के लिए मुश्किल फैसले ले सकते हैं। इसके बाद रतन टाटा ने वह कर दिखाया जो जेआरडी कभी नहीं कर सके। समूह को एकजुट किया बल्कि अपने विरोधियों को भी मात दी। सीईओ के नाम में टाटा जुड़ा हो तो उसे ही ऐसा करने की नैतिक ताकत होती है। समय के साथ समूह में रूसी मोदी और केरकर किनारे कर दिए गए। शेष दो भी ज्यादा समय तक रतन के लिए चुनौती नहीं रह सके। 
 
जेआरडी का फैसला सही था। यह सिर्फ कंपनी के आकार से नहीं बल्कि रतन टाटा के फैसलों से भी साबित हुआ। जिससे उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुना। रतन चाहते तो अपने सौतेले भाई नोएल टाटा को उत्तराधिकारी चुन सकते थे। कोई विरोध नहीं करता। जेआरडी के फैसले पर किसी ने उंगली नहीं उठाई तो रतन के फैसले पर कौन सवाल करता? लेकिन रतन जानते हैं कि कंपनी और समय बदल चुका है। आकार के लिहाज से कंपनी पर बड़े शेयर होल्डर का काबिज होना जरूरी है। आखिर दुनिया के 80  देशों में समूह की 100 से ज्यादा कंपनियां काम कर रही हैं। सिर्फ टाटा नाम से कंपनी को जोड़े रखना मुश्किल है। उन्होंने साइरस मिस्त्री को चुना। साइरस निर्माण कंपनी के मालिक पालोनजी मिस्त्री के बेटे हैं। रतन टाटा ने अपने किसी क्लोन को नहीं चुना। 
 

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