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Warren Buffett
निवेश की दुनिया में भव‍िष्‍य के बजाय अतीत को देखना ज्‍यादा बड़ी समझदारी है।

सुपर रिच पर सुपर टैक्स लगाने का वक्त

मधुरेन्द्र सिन्हा | Jan 09, 2013, 00:51AM IST
सुपर रिच पर सुपर टैक्स लगाने का वक्त

अमेरिका के सबसे अमीर कारोबारी वारेन बफेट ने वहां की सरकार से खुलेआम कहा था कि ज्यादा पैसा कमाने वालों पर ज्यादा टैक्स लगाओ।

लगता है राष्ट्रपति बराक ओबामा को उनका यह सुझाव पसंद आ गया और उन्होंने सुपर रिच पर अब ज्यादा टैक्स लगा दिया। हालांकि अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में इस तरह के टैक्स प्रस्ताव पहले कभी सोचे नहीं जा सकते थे लेकिन वहां की अर्थव्यवस्था की पतली हालत ने ओबामा को बाध्य कर दिया कि वह ऐसा कदम उठाएं। अब वहां ज्यादा धन कमाने वालों पर टैक्स बढ़ाकर 35 से 39.6 फीसदी कर दिया है।

इतना ही नहीं नए कानून के तहत दो लाख डॉलर से ज्यादा निवेश करने वालों पर 3.8 फीसदी टैक्स लगा दिया गया है। ओबामा ने यह ऐतिहासिक कदम उठाकर भारत सहित अन्य देशों के लिए एक रास्ता खोल दिया है, जो राजस्व की कमी का रोना रो रहे हैं।

अब भारत में इस पर बहस छिड़ गई है कि क्या ज्यादा धन कमाने वालों पर ज्य़ादा टैक्स लगाया जाए। दरअसल इसके पीछे तर्क यह है कि सरकार अपने खर्च घटाने की स्थिति में न हो तो राजस्व बढ़ाने के लिए उसे रास्ता तो ढूंढऩा ही होगा।

आखिर एक लोकतांत्रिक और जनकल्याण का दावा करने वाली सरकार के सामने जब राजस्व का संकट हो तो क्या उसे उन लोगों से ज्यादा टैक्स नहीं लेना चाहिए जो वाकई बहुत धन कमा रहे हैं? क्या सरकार उन लोगों से और उम्मीद नहीं कर सकती है, जो अब इस स्थिति में हैं कि बिना कष्ट उठाए कुछ और दे सकें ?  क्या सरकारें उनसे उम्मीद नहीं कर सकती हैं कि वे उसकी झोली में थोड़ा और डाल दें? आखिर उनके लिए जरूरी संसाधन सरकार ने ही तो जुटाए हैं।

प्रधान मंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन ने इसके पक्ष में बयान देकर इस पर चर्चा गर्म कर दी है। ये सारे मुद्दे ऐसे हैं कि इन पर लंबी बहस हो सकती है लेकिन अगले बजट की तैयारी के लिए सरकार के पास समय नहीं है।

भारत में इस समय सभी तरह के सरचार्ज लगाकर अधिकतम इनकम टैक्स 33 फीसदी है और सरकार ने तीन तरह के स्लैब बना रखे हैं ताकि हर आय वर्ग के लोगों को उनकी कमाई के मुताबिक टैक्स देना पड़े। सरकार ने 1997-98 के बजट में अधिकतम टैक्स की सीमा घटाकर एक क्रांतिकारी कदम उठाया था और उसकी सराहना भी हुई।

उस समय किसी ने इस बात के लिए तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम की आलोचना नहीं की कि उन्होंने ज्यादा पैसे वालों पर टैक्स क्यों घटा दिया। सरकार को इसका पुरस्कार अधिक राजस्व वसूली के रूप में मिला और उसकी झोली भर गई। लेकिन अब हालात बदल गए हैं और सरकार के पास राजस्व बढ़ाने के विकल्प कम हैं, जबकि उसके खर्च बढ़ते चले जा रहे हैं।

मनरेगा जैसी ग्रामीण कल्याण की योजनाओं के लिए उसके पास सीमित धन है और इस बार कई योजनाओं के सामने कटौती का संकट खड़ा हो गया है। सरकार के खर्च हैं कि बढ़ते जा रहे हैं जबकि कमाई का आलम यह है कि वे घट ही रहे हैं। उसके पास राजस्व बढ़ाने के साधन बहुत कम हैं।

इस विशाल देश में जहां सवा सौ करोड़ की आबादी में महज तीन करोड़ लोग ही टैक्स देते हैं और सिर्फ सवा चार लाख लोग ही ऐसे हैं जिनकी इनकम  20 लाख रुपये से ज्यादा है और उनसे सरकार लगभग एक लाख करोड़ रुपये वसूलती है। यह निराशाजनक आंकड़ा है और सरकार इसमें बढ़ोतरी के लिए कुछ नहीं कर पाई है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सवा तीन करोड़ लोग ही टैक्स देने योग्य हैं अथवा सिर्फ सवा चार लाख लोग ही 20 लाख रुपये सालाना से अधिक कमाते हैं। सवा तीन करोड़ लोगों में भी ज्यादा संख्या उनकी है जो 1,000 रुपये या इससे कम टैक्स देते हैं। इनसे कई गुना ज्यादा लोग इस वर्ग में होंगे लेकिन हमारे टैक्स कानून और सरकार की नीतियां ऐसी हैं कि टैक्स न देने वालों का तादाद काफी ज्यादा है।

स्वतंत्र प्रोफेशनल जैसे चार्टर्ड अकाउंटेंट, डॉक्टर, वकील और बड़े दुकानदार जिनकी कमाई तो बहुत है, लेकिन वे टैक्स बहुत कम देते हैं। इनका सरकार के खजाने में योगदान निराशाजनक है और यह वित्त मंत्रालय के लिए चिंता का विषय है। इसके अलावा कृषि से आय प्राप्त करने वालों पर कोई टैक्स नहीं है और यह बहस का विषय रहा है।

हैरानी की बात है कि वित्त मंत्रालय ने टैक्स का दायरा बढ़ाने के लिए कोई ठोस नीति कभी नहीं बनाई। टैक्स का दायरा बढ़ाना यानी उन लोगों को भी टैक्स देने के लिए मजबूर करना जो अभी टैक्स नहीं देते हैं, एक कठिन और दुष्कर कार्य है। इस पर गंभीरता से काम नहीं हुआ।

मतलब साफ है कि कम से कम इस बजट में सरकार के पास विकल्प हैं ही नहीं। तो फिर वित्त मंत्रालय क्या करेगा ? पहले तो वह उन योजनाओं पर कैंची चलाएगा जो तुरंत फल नहीं देने वाले हैं क्योंकि उसे उन गैर योजनाओं के लिए भी धन चाहिए जो जनता को लुभा सकें। यूपीए सरकार की मजबूरी है कि वह चुनाव की दहलीज पर खड़ी है और उसे पैसा वैसे मदों में खर्च करना है जो लोकलुभावनी हो ताकि वोट मिल सकें।

यानी कि इनका विकास में कोई योगदान नहीं होगा बस कहने को इससे गरीबों का फायदा होगा!  एक और बात है कि सरकार प्रशासन चलाने के अपने खर्च पर जरा भी अंकुश नहीं लगा पाई और कर्मचारियों की तनख्वाह, मंत्रियों-सांसदों पर खर्च घटने की बजाय बढ़ता ही गया। मितव्ययिता के तमाम सरकारी दावे खोखले रह गए।

ऐसे में अब सरकार के पास इतने कम विकल्प हैं कि वह पुराने ढर्रे पर चलने के लिए बाध्य है। सरकार को अब यह सोचना होगा कि क्या वह ज्यादा पैसे वालों पर थोड़ा बोझ डाल सकती है ? यह शायद संभव हो क्योंकि 1997 के पहले तो देश में टैक्स की दरें ऊंची भी थीं और अति धनी लोगों की कमाई भी इतनी नहीं थी।

लेकिन तब सरकार को इस बात को भी सुनिश्चित करना होगा कि ब्याज दरें कम से कम दो फीसदी घटें। अत्यधिक ब्याज दरों के कारण हमारे देश के विकास पर दबाव पड़ा है और कारोबार पर बुरा असर पड़ा है। कंपनियों की लाभदेयता घटी है।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों के लाभ में भारी बढ़ोतरी हुई है और धन कुबेरों की संख्या भी बड़ी तेजी से बढ़ी है। फोब्र्स 100 में अब कई भारतीयों के नाम हैं और भारतीय समृद्धि के मामले में पश्चिम के करीब पहुंचते जा रहे हैं। लेकिन जहां अमेरिका जैसे देशों में दान की प्रवृति बढ़ी है, वहीं भारत में ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है।

दुनिया के सबसे अमीर लोगों में स्थान रखने वाले वारेन बफेट, बिल गेट्स, मार्क ज़करबर्ग जैसे सुपर रिच अपनी संपत्ति का एक हिस्सा दान दे रहे हैं। इससे समाज के गरीब तबके के लिए एक उम्मीद जगी है।

मधुरेन्द्र सिन्हा
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। देश में रईसों पर ज्यादा टैक्स की बहस को आगे बढ़ाता उनका यह लेख।

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अमेरिका के सबसे अमीर कारोबारी वारेन बफेट ने वहां की सरकार से खुलेआम कहा था कि ज्यादा पैसा कमाने वालों पर ज्यादा टैक्स लगाओ।

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