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निवेश कोई खेल नहीं,जहां कोई बलवान किसी कमजोर को हरा दे
घीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं राष्ट्रीय बचत योजनाएं

फीका आकर्षण
:लोकप्रिय एनएससी, किसान विकास पत्र अब आकर्षक नहीं
:निवेशकों को बैंकों में भी लघु बचत के बराबर ब्याज मिल रहा
:राज्य सरकार ने लघु बचत बढ़ाने पर अपना फोकस घटाया
:जमा राशियों से कहीं ज्यादा निकासी, शुद्ध जमा नकारात्मक
:प्रोत्साहन प्रयास बंद होने से निवेशक पीछे हटे

दरकार नहीं
:बैंकों से राज्य सरकारों को मिल रहा सस्ता कर्ज
:लघु बचत के जरिये जमा राशियों पर खर्च कहीं ज्यादा
:सरकार ने लघु बचत के लिए सभी तरह के प्रोत्साहन बंद किए
:सरकार के लिए अप्रासंगिक बन कर  रह गईं योजनाएं
:जिला स्तरीय प्रोत्साहन शिविरों व योजनाएं बंद
:अल्प बचत निदेशालय को भी भंग कर दिया सरकार ने

प्रोत्साहन के अभाव में राजस्थान में पिछले तीन साल से राष्ट्रीय बचत योजनाओं (एनएसएस) के तहत जमा राशि में लगातार गिरावट आ रही है। इतना ही नहीं राष्ट्रीय बचत योजनाओं में जमाओं के मुकाबले निकासी ज्यादा होने से अब इन योजनाओं के तहत सकल जमा वृद्धि दर नकारात्मक हो गई है।


इन योजनाओं में जमाओं में गिरावट की वजह राज्य सरकार की ओर से राजस्थान अल्प बचत निदेशालय का एक अप्रैल 2010 से ट्रेजरी विभाग में विलय के साथ प्रोत्साहन अभियान बंद करना और डाकघरों की ओर से एक अप्रैल 2011 से बचत योजनाओं में लगे एजेंटों का हटाना बताया गया है। इसके अलावा राष्ट्रीय बचत योजनाओं के तहत मिलने वाला ब्याज बैंकों व वित्तीय संस्थानों की ओर से दिए जाने वाले ब्याज से कम होने के कारण भी निवेशकों का इनसे मोह भंग हुआ है।


वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान नवंबर तक राजस्थान में राष्ट्रीय बचत योजनाओं के तहत सकल जमाएं 662.49 करोड़ रुपये, जबकि शुद्ध जमा राशि 69.56 करोड़ रुपये कम हो गई क्योंकि निकासी इससे भी कहीं ज्यादा रही।


जबकि पिछले वित्त वर्ष 2011-12 की समान अवधि में सकल जमाएं 693.69 करोड़ रही और शुद्ध जमा 97.98 करोड़ रुपये घट गई। वहीं प्रदेश में अब तक इन योजनाओं के तहत सकल जमाएं 5984.74 करोड़ हैं, जो पिछले वित्त वर्ष में नवंबर तक 5565.74 करोड़ रुपये थी।


जबकि इस साल अब तक विभिन्न योजनाओं के तहत पूर्ण हो चुकी स्कीम  के अनुरूप निवेशकों को 615.10 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। इस तरह अब जमाओं से ज्यादा भुगतान होने लगा है। राष्ट्रीय बचत संस्थान के राजस्थान में क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारियों के अनुसार डाकघर भी अब निवेशकों को इन योजनाओं के प्रति आकर्षित करने में कोई रुचि नहीं ले रहे हैं।


अब निवेशक ही आयकर संबंधी छूट के लिए इन योजनाओं में पैसा लगा रहे हैं। निवेशकों का रुझान भी डाकघर आवर्ती योजना,  डाकघर बचत खाता, मासिक आय योजना और लोक भविष्य निधि खाते जैसी योजनाओं में ही रह गया है। इसकी वजह केंद्र सरकार की ओर से इंदिरा विकास पत्र व किसान विकास पत्र जैसी लोकप्रिय योजनाओं को बंद करना है। पहले इन योजनाओं में निवेशक काफी पैसा लगाते थे।


दूसरी तरफ राजस्थान के अल्प बचत प्रकोष्ठ के अधिकारियों का कहना है कि देसी-विदेशी बैंकों व वित्तीय संस्थानों से सस्ता व आसान कर्ज उपलब्ध होने से राज्य सरकार को अब राष्ट्रीय बचत योजनाओं में जमा राशि के बदले ऋण की दरकार नहीं है। दरअसल, इन योजनाओं में जमाओं के बदले ऋण महंगा बैठता है, इसलिए राज्य सरकार का लघु बचत प्रोत्साहन अभियान से मोहभंग हो गया है।


राज्य सरकार ने राष्ट्रीय बचत योजनाओं के लिए जिला स्तर पर आयोजित किए जाने वाले प्रोत्साहन शिविरों व प्रोत्साहन योजनाओं को बंद करने के साथ अल्प बचत निदेशालय को भंग कर दिया है। राज्य सरकार का तर्क है कि प्रोत्साहन अभियान व विभाग चलाने का खर्च उसे बेवजह उठाना
पड़ रहा था क्योंकि अब बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों से आसानी से कम ब्याज पर दीर्घावधि व लघु अवधि कर्ज मिल जाता हैं। ऐसे में राजस्थान अल्प बचत निदेशालय को चलाने का कोई कारण नहीं बचा है। 


उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने प्रदेश में अल्प बचत विभाग को एक अप्रैल 2010 से ट्रेजरी विभाग में विलय करने के साथ अल्प बचत प्रकोष्ठ बना दिया है। दो साल पहले राजस्थान अल्प बचत निदेशालय में लगभग 250 लोगों का स्टाफ था, लेकिन अब करीब पांच कर्मचारी रह गए हैं। बाकी कर्मचारियों को दूसरे विभागों में समायोजित कर दिया गया है।


अल्प बचत प्रकोष्ठ के कर्मचारी भी लघु बचत योजनाओं को प्रोत्साहन की बजाय रिकवरी में लगे हैं। इससे बचत योजनाओं के तहत जमा राशि में लगातार गिरावट आ रही है। पहले इन योजनाओं में पैसा लगाने के लिए राज्य सरकार प्रोत्साहन बतौर निवेशकों को सोने-चांदी के सिक्कों के साथ जिला कलेक्टरों को जमाओं के लिए मासिक लक्ष्य देती थी। लेकिन अब न तो प्रोत्साहन के लिए सिक्के हैं, न ही कोई लक्ष्य। इसलिए प्रदेश में राष्ट्रीय बचत योजनाओं में जमाओं का आंकड़ा लगातार घट रहा है।


जबकि केंद्र सरकार अब राष्ट्रीय बचत योजनाओं के तहत जमा होने वाली राशि का 75 से 100 फीसदी के बराबर दीर्घावधि कर्ज मुहैया कराने को तैयार है, लेकिन यह कर्ज काफी महंगा पड़ता है। दूसरी तरफ राज्य आयोजना बोर्ड अधिकारियों का कहना है कि देश और समाज के विकास के लिए सूक्ष्म लघु बचत को आजीविका से जोडऩा जरूरी है। इसके लिए बचत योजनाओं के लिए निजी सहभागिता के साथ नीति को मजबूत बनाकर काम करना होगा।

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