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Peter Drucker
मुनाफा किसी कंपनी के लिए उसी तरह है जैसे एक व्यक्ति के लिए ऑक्सीजन।
चुनौतियों से घिरी रहेगी ऑटो इंडस्ट्री

भारत के तीव्र आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की रफ्तार अब सुस्त पड़ती जा रही है। लगभग सवा करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देने वाली यह इंडस्ट्री अभी मंदी की चपेट में जाती दिख रही है।


नवंबर महीने के आंकड़े बता रहे हैं कि यह अब धीमेपन का शिकार होती जा रही है क्योंकि दीवाली जैसे बड़े त्योहार के बावजूद कारों और अन्य वाहनों की बिक्री में बहुत मामूली इज़ाफा हुआ, जिससे दिसंबर के प्रति चिंता जग गई है।


सभी कार निर्माता कंपनियों ने इस बार डिस्काउंट और ऑफरों की झड़ी लगा दी थी लेकिन कोई खास फर्क नहीं पड़ा और कुल बढ़ोतरी महज सात फीसदी की ही रही। कई कंपनियों ने तो अपने बिल्कुल नए मॉडल भी पेश किए लेकिन कोई खास परिणाम नहीं निकला। यह बात इसलिए भी हैरान करती है क्योंकि 2008-09 की विश्वव्यापी मंदी को भी भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग झेल गया था लेकिन इस बार इसके पहिये ठिठक रहे हैं। इस साल के उत्तराद्र्ध से ही कारों और ऑटो पाट्र्स की बिक्री में फर्क साफ दिखाई देने लगा है।


ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस इंडस्ट्री में 2012-13 में बढ़ोतरी महज एक से तीन फीसदी तक की होगी, जबकि पहले यह नौ से ग्यारह फीसदी होने की संभावना व्यक्त की जा रही थी। इतना ही नहीं अगले साल के बारे में भी कोई बहुत उम्मीद नहीं जग रही है और ऐसा लग रहा है कि अगला साल भी कुछ ऐसा ही बीतेगा।


देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति-सुजुकी ने गुजरात में अपने नए प्लांट में बहुत ज्यादा उत्पादन की संभावनाओं से इनकार कर दिया है। कंपनी वहां की उत्पादन क्षमता महज ढाई लाख कारों की ही रखेगी क्योंकि उसे कार बाज़ार की क्षमता पर संदेह है। उत्पादन क्षमता में विस्तार के बारे में कंपनी फिर से सोचेगी। मारुति की ही तरह कई और कंपनियां अब अपने विस्तार पर फिर से विचार कर रही हैं। वे बड़े लक्ष्य लेकर कोई बड़ा विस्तार नहीं करना चाहती हैं। इन हालातों में ऑटोमेटिव मिशन प्लान (एएमपी) 2006-16 का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल लग रहा है।


इसका लक्ष्य था इंडस्ट्री को 145 अरब डॉलर तक ले जाकर भारत को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल निर्माता देश बनाना। अगर हालात ऐसे ही रहे तो इस ल्क्ष्य में 20-25 फीसदी तक की कटौती करनी पड़ सकती है। सोसायटी ऑफ ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (सियाम) के मुताबिक इसके तीन तत्व मुख्य रूप से जिम्मेदार हंै।  पहला, देश की आर्थिक विकास की धीमी दर, मुद्रास्फीति, जिसमें पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें भी शामिल हैं और ऊंची ब्याज दरें।


आर्थिक विकास की दर कुछ साल पहले नौ फीसदी थी लेकिन अब यह घट कर छह फीसदी से भी नीचे जाती दिख रही है।  इससे देश की प्रति व्यक्ति आय में भी गिरावट आई है और इसका सीधा असर कारों की बिक्री पर पडऩा स्वाभाविक है। इसका मतलब हुआ कि पहले जहां कारों की बिक्री में 14-15 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्मीद थी वहीं अब यह नौ-दस फीसदी पर रह जाएगी। सबसे ज्यादा निराशाजनक प्रदर्शन तो दोपहिया वाहनों की बिक्री में होने की आशंका है। पहले उम्मीद थी कि यह 11 से 13 फीसदी की दर से बढ़ेगा लेकिन अब इसके 5 से 7 फीसदी की दर से बढऩे का अनुमान लगाया जा रहा है।


दोपहियों का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि इनसे ग्रामीण भारत में हो रही आर्थिक प्रगति की एक झलक मिलती है। लेकिन सबसे ज्यादा निराशा हुई है निर्यात के आंकड़ों को देखकर। अप्रैल-नवंबर 2012 में कारों के निर्यात में पिछले साल की सुलना में 4.57 फीसदी की गिरावट आई है। भारत वाहन निर्यात का एक बड़ा केंद्र बनने जा रहा है और कई कंपनियां यहां से कारों का निर्माण करके विदेश में भेज रही हैं। भारत से कॉमर्शियल वाहनों का बड़ा निर्यात हो रहा है लेकिन इस बार इस अवधि में तो इसमें 1.37 फीसदी की गिरावट ही देखने में आई है।


दुनिया के कई देशों में आई मंदी का असर यहां दिखाई दे रहा है। इसमें तुरंत कोई बदलाव की गुंजाइश नहीं है और हमें सही वक्त का इंतजार करना होगा। लेकिन जहां तक भारत की बात है तो यहां मुद्रास्फीति का कुल बिक्री पर असर पड़ा है। महंगाई के न रुकने से लोगों के उपभोग की शक्ति घटी है और वे कार जैसे बड़े आयटमों की खरीद को कुछ समय के लिए टाल रहे हैं।


हालांकि कार और टू व्हीलर कंपनियों ने अच्छे डिस्काउंट दिए हैं और अनेक उपहारों की भी घोषणा की है लेकिन इसका असर उतना नहीं पड़ा। इसका एक कारण यह भी है कि ब्याज की दरें भी बहुत ज्यादा हो चुकी हैं, जिससे कारों की ईएमआई भी बढ़ गई है। ब्याज दरों का असर पडऩा स्वाभाविक है क्योंकि यह आपके मासिक खर्च के बजट पर सीधा प्रभाव डालता है। अब जबकि उम्मीद है कि अगले साल इसमें कुछ कमी आएगी तो शायद कारों की बिक्री भी बढ़े।


पेट्रोल की कीमतें भी कारों-दोपहियों की बिक्री में एक बाधा बनती जा रही है। भारत उन देशों में है जहां पेट्रोल सबसे महंगा है। इस कारण से यहां सभी कार कंपनियां डीजल चालित कारें बना रही हैं। जापानी कंपनी होंडा ने जो डीजल की कारें नहीं बनाती थी, भारत के लिए डीजल का नय़ा इंजिन विकसित किया है। डीजल के अलावा सीएनजी भी एक बड़ा विकल्प है, जिससे कारें चलती हैं।


ज्यादातर कंपनियां अब सीएनजी इंजिन युक्त कारें बना रही हैं, जिससे इस इंडस्ट्री को और बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। लेकिन अभी इस मामले में बहुत निराश होने की जरूरत है। ऑटो इंडस्ट्री में इसे एक चक्र माना जाता है। तेजी के बाद थोड़ी मंदी और मंदी के बाद तेजी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। भारत में जिस गति से शहरीकरण हो रहा है उससे ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है।


दिल्ली-मुंबई जैसे महानगर ही नहीं बल्कि छोटे-छोटे शहरों के विकास का इस पर असर पड़ेगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में विस्तार के साथ ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को सहारा मिलेगा। और सड़कें बनने से इनकी बिक्री पर फर्क पड़ेगा। कृषि आय में बढ़ोतरी लोगों को और वाहन खरीदने के लिए प्रेरित करेगी। जिस तरह से अब छोटे शहरों में भी लोगों की आय बढ़ी है उसका असर ऑटोमोबाइल क्षेत्र पर निश्चित रूप से पड़ेगा। लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी है कि सड़कों का और विकास हो ताकि वाहनों की बढ़ती संख्या को खपाया जा सके।


कार इंडस्ट्री ने अमेरिका को दुनिया के सबसे उन्नत देश बना दिया था। भारत के साथ भी यह बात लागू होती है और यहां भी यह हमारे जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान कर रही है। इसने इतनी बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार दिया है कि यह सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले उद्योगों में शामिल हो गया है। अगर यह और फले-फूलेगा तो इससे देश की तरक्की को और बढ़ावा मिलेगा। इसलिए सरकार को भी चाहिए कि वह इसकी राह में बाधाओं को दूर करने का प्रयास करे।


मधुरेन्द्र सिन्हा
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की सुस्ती पर उनका यह लेख।

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