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शेयर बाजार में लोग सीखते कुछ नहीं,भूल सब कुछ जाते हैं।

नये शहर में नौकरी कहीं फिजूलखर्च तो नहीं बना रही?

आदिल शेट्टी | Feb 16, 2013, 19:10PM IST
नये शहर में नौकरी कहीं फिजूलखर्च तो नहीं बना रही?

जीवन-यापन और करियर के चलते आपको नासिक से पुणे, जोरहाट से पोरबंदर, तिरुपुर से कोयंबटूर, विजयवाड़ा से हैदराबाद, मुंबई से लातूर, बेंगलुरु से मुंबई, दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को या कहीं और जाना पड़ सकता है। आप यहां तक कि भटिंडा से न्यूजर्सी भी पहुंच सक ते हैं।

एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने पर जीवन के नए-नए अनुभवों से सामना होता है। कुछ नया सीखने को मिलता है कि कैसे चलें, बोलें, रहें, खाएं, पिएं, पहने या फिर खर्च करें। शहर बदलने के साथ ही आपको नये शहर की जीवनशैली और वहां की बोलचाल के हिसाब से खुद को ढालना होता है।

भुवना के लिए भी कुछ ऐसा ही था। पिछले दिनों उसकी जिंदगी में एक एक्साइटिंग समय तब आया जब वह चेन्नई से मुंबई आई। मुंबई में करियर के अच्छे अवसर हैं और संभावनाएं भी बेहतर हैं। साथ ही यहां सीखने के मौके भी खूब हैं।

लिहाजा भुवना अपने पति साथ चेन्नई से मुंबई पहुंचने पर काफी खुश थी। स्मार्ट दंपत्ति और पर्सनल फाइनेंस प्लानिंग में प्रशिक्षित इस जोड़ी के लिए चेन्नई से चलने के पहले ही गुणा भाग शुरू हो गया कि ओके, नए वेतन में हम ज्यादा खर्च करेंगे और ज्यादा बचाएंगे भी।

नया शहर: खर्च के नए मौके
एक छोटे से शहर में आप फ्री टाइम में, सप्ताहांत में सेलिब्रेशन में आखिर कर ही क्या सकते हैं। अमूमन लोग मंदिर जाते हैं, अपने रिश्तेदारों के यहां जाते हैं या दोस्तों के साथ डिनर पर जाते हैं, या फिर वहां के सिनेमाघर में एक फिल्म देखते हैं।

बस। वहां विकल्प सीमित होते हैं और सारा कुछ अपेक्षाकृत सस्ते में निपट जाता है। बजट पर ज्यादा बोझ डाले बिना। पर मेट्रोपॉलिटन सिटी में, एक बड़े शहर में आप काफी कुछ कर सक ते हैं, वहां पर आपके विकल्प विस्तृत होते हैं- मॉल्स, पब्स, मल्टीप्लेक्स, बेहतरीन सिनेमाघरों में पिक्चर, पंच सितारा होटलों में भोजन।

इनमें से सभी बहुत मंहगे हैं यानी कि सारी कमाई को सोख लेने वाले। और जब तक आपको समझ में आता है तब तक आपकी सारी कमाई उड़ चुकी होती है, आपकी जेब खाली हो चुकी होती है। क्रेडिट कार्ड कार्ड का बोझ भी बढ़ता जाता है।

हर चीज ज्यादा महंगी नहीं
मकान का किराया, शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन आदि मंहगे हो सक ते हैं। पर कुछ चीजें सस्ती भी होती हैं। हाउस हेल्प, परिवहन, कपड़े सस्ते हो सकते हैं। यह कैसे होगा। ज्यादा लोग, ज्यादा पैसा, ज्यादा खर्च करने की क्षमता का मतलब बड़ा बाजार होना है।

इसका मतलब यह है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा है और जिस बाजार स्थल में प्रतिस्पर्धा हो, तो वहां जीत किसकी होगी, वहां का राजा आखिर कौन होगा। ग्राहक। उपभोक्ता। यह वही बिंदु है जहां पर आप अपने खर्चे को नियंत्रण में रख सकते हैं। कम से कम आप अपने छोटे से शहर के मछली विक्रेता के अकेले सहारे तो नहीं हैं। यहां पर आपके सामने कई विकल्प हैं।

रहन-सहन मानक के अनुसार
ज्यादा अवसरों का मतलब ज्यादा प्रतिस्पर्धा का नियम तभी सिर्फ लागू नहीं होता, जब आप ग्राहक हों, बल्कि यह तब भी लागू होता है जब आप वेंडर भी हों। कार्यस्थल पर, आपके कारोबार में या फिर आपके प्रोफेशन में आप संभवत: बहुत सक्षम व होशियार लोगों के साथ कम करते हों, आपको सर्वोत्तम मस्तिष्कों से भी प्रतिस्पर्धा करनी है। आपका रहन सहन-वेशभूषा बेहतरीन होनी ही चाहिए।

यानी कि यहां पर कुल मिलाकर मेरा कहना यह है कि आपका रहन-सहन मानक के अनुसार होना चाहिए। और यह कहने की जरूरत नहीं है कि इन सब में पैसे लगते हैं। ये निवेश हैं जो कि आपको अपनी ऊंची कमाई को मेनटेन करने होंगे ताकि आप आगे बढ़ सकें।

स्थानीय बाजार को परखिए
जो लोग आपसे पहले वहां रह रहे हैं उन्हें कई चीजों का अनुभव है। इसलिए अपने पड़ोसियों से आपकी बातचीत होती रहे आप उनसे रिश्ते रखे रहें, इससे भी कुछ खर्चे कम करने में मदद मिलती है। जैसा कि भुवना ने किया। भुवना को उसकी पड़ोसन ने कम वेतन में नौकरानी का इंतजाम करवा दिया और साथ ही दूधवाले से मिलवाया, कार खरीदने में मदद की और भी कई बातों में सहायता की।

अपनी खपत का पैटर्न बदलिए
यह बात सही है कि चावल की कीमत 50 फीसदी ज्यादा है यहां, पर यह भी तो मानिए कि गेहूं सस्ता है। दक्षिण भारतीयों को जो सब्जियां पसंद हैं वे यहां पर महंगी मिलती हैं। पर जो सब्जियां स्थानीय खानपान का हिस्सा हैं वे तो सस्ती हैं और साथ ही आसानी से मिल भी जाती हैं।

फिल्टर कॉफी लक्जरी है पर चाय सस्ती है। लिहाजा आप अपनी अपनी खपत का पैटर्न बदलिए यानी कि स्थानीय खानपान अपनाइए और आप इस तरह भी अपने खर्च को नियंत्रण में रख सकते हैं।

बदलावों को आत्मसात कीजिए
बदलाव तो जीवन का हिस्सा हैं इससे बचा नहीं जा सकता। लोकल ट्रेंड, फूड, लिविंग, स्वाद में अपने को एडजस्ट कीजिए। भुवना और राम इसे करने में समर्थ हैं तो आप क्यों नहीं कर सकते।
आदिल शेट्टी- लेखक बैंकबाजार डॉट कॉम के सीईओ हैं।

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