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कॉटन के मूल्य में 10% तक और गिरावट संभव

बिजनेस ब्यूरो | Jan 26, 2013, 00:09AM IST
कॉटन के मूल्य में 10% तक और गिरावट संभव

रणनीति - कॉटन ट्रेडर्स का क्रेडिट प्रोफाइल इस पर निर्भर करेगा कि वे स्टॉक को कैसे सीमित स्तर पर ला पाते हैं। वे सौदों के अनुसार ही कॉटन की खरीद कर रहे हैं। मूल्य में गिरावट आने पर ऐसे ट्रेडर कम प्रभावित होंगे। लेकिन मार्जिन का दबाव उन पर भी रहेगा।

कॉटन उद्योग में मार्जिन पर दबाव बढऩे का अंदेशा : रिपोर्ट

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इंडिया क्रेडिट रेटिंग्स का अनुमान है कि चालू वर्ष 2013 के दौरान घरेलू बाजार में कॉटन के मूल्य मौजूदा निचले स्तर पर स्थिर रहेंगे या फिर इसमें 5 से 10 फीसदी की गिरावट आ सकती है। एजेंसी ने कॉटन सेक्टर का निगेटिव आउटलुक माना है।

रेटिंग एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्टॉक ज्यादा होने के कारण घरेलू बाजार में मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। इससे निगेटिव आउटलुक रहने की आशंका है। चालू वर्ष के दौरान कॉटन के दाम मौजूदा निचले स्तर पर बने रह सकते हैं।

यह भी संभव है कि आने वाले महीनों के दौरान भाव में 5 से 10 फीसदी की और गिरावट आए। इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉटन का स्टॉक कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। स्टॉक और खपत के बीच का अनुपात 71 फीसदी पर होने का अनुमान है।

वैश्विक स्तर के कुल स्टॉक में से करीब 50 फीसदी स्टॉक सिर्फ चीन में है। चीन के नीति निर्धारकों के फैसले के कारण वहां 90 लाख टन कॉटन का स्टॉक हो गया है।

सिर्फ एक देश में इतना विशाल भंडार पूरे अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए जोखिम बन सकता है। दूसरी ओर विश्व स्तर पर कॉटन का उत्पादन काफी ज्यादा है जबकि खपत सीमित है। इस वजह से मूल्य में गिरावट आने के आसार है।

रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख कॉटन ट्रेडर्स का क्रेडिट प्रोफाइल इस पर निर्भर करेगा कि वे स्टॉक को कैसे सीमित स्तर पर ला पाते हैं। ट्रेडर अपने स्टॉक को न्यूनतम स्तर पर रख रहे हैं। वे सौदों के अनुसार ही कॉटन की खरीद कर रहे हैं। मूल्य में गिरावट आने पर ऐसे ट्रेडर कम प्रभावित होंगे। लेकिन ऐसे कारोबारियों के भी मार्जिन पर दबाव रह सकता है।

खाद्य तेल उद्योग पर भी रहेगा दबाव
नई दिल्ली - इंडिया रेटिंग्स ने भारतीय खाद्य तेल उद्योग के लिए निगेटिव आउटलुक दिया है। मार्केटिंग वर्ष 2011-12 (नवंबर-अक्टूबर) के दौरान मौसम अच्छा रहने की वजह से पाम तेल का उत्पादन ज्यादा रहा। इसके कारण वैश्विक स्तर पर निकलने वाली मांग फीकी पड़ रही है।

इसका नतीजा है कि खपत अनुमान के अनुपात में वैश्विक स्तर का स्टॉक छह साल के उच्च स्तर पर पहुचं गया है। पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी डॉलर मूल्य में पाम तेल के दाम करीब 25 से 28 फीसदी गिरे हैं। भारतीय बाजारों में भी इसी के अनुरूप गिरावट आई है। (एजेंसी)

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