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पांच साल में 30 लाख करोड़ हो जाएगा बीमा कंपनियों का कोष

बिजनेस ब्यूरो | Feb 21, 2013, 00:05AM IST
पांच साल में 30 लाख करोड़ हो जाएगा बीमा कंपनियों का कोष

क्या कहा हरिनारायण ने
बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा बढ़ाकर 49 फीसदी होनी चाहिए
प्राकृतिक आपदा के मामलों में उचित बीमा कवर देना  बहुत जरूरी
रि-इंश्योरेंस उत्पादों को और मजबूत बनाए जाने की है जरूरत

कार्यकाल के महत्वपूर्ण फैसले
जीवन बीमा कंपनियों के स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध होने के दिशानिर्देश जारी किए। साथ ही, थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस पूल को समाप्त किया गया और हेल्थ इंश्योरेंस में पोर्टेबिलिटी की शुरुआत की गई।

जे. हरिनारायण
चेयरमैन, बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा)


भारत की बीमा कंपनियों के प्रबंधन के अधीन परिसंपत्तियां अगले पांच साल में 70 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 30 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच जाएंगी। यह कहना है बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) के चेयरमैन जे. हरिनारायण का।

हरिनारायण पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद बुधवार को इरडा चेयरमैन के पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनकी जगह, भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के पूर्व चेयरमैन टी. एस. विजयन का नाम इरडा चेयरमैन के तौर पर चल रहा है, लेकिन इस बारे में अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

हरिनारायण ने कहा कि वर्ष 2000 में जब बीमा इंडस्ट्री को खोला गया तो इसके अधीन कुल फंड एक लाख करोड़ रुपये के स्तर पर था। वर्ष 2008 में यह बढ़कर आठ लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया और मौजूदा समय में बीमा कंपनियां 18 लाख करोड़ रुपये के कोष का प्रबंधन कर रही हैं। यह इसी तरह बढ़ा है। पांच साल के बाद यह बढ़कर 30 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच जाएगा।

बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के मामले पर हरिनारायण ने कहा कि वह इसे बढ़ाकर 49 फीसदी करने के पक्ष में हैं। इससे पूंजी की प्रमुखता वाले इस सेक्टर में फंड की आवक में खासी बढ़ोतरी होगी। एक अनुमान के मुताबिक, बीमा उद्योग को अगले पांच सालों के दौरान अपना आकार बढ़ाकर दोगुना करने के लिए 30,000 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी।

हरिनारायण के कार्यकाल में इरडा ने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इस दौरान मुख्य तौर पर जीवन बीमा कंपनियों के स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध होने के दिशानिर्देश जारी किए।साथ ही, थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस पूल को समाप्त किया गया और हेल्थ इंश्योरेंस में पोर्टेबिलिटी की शुरुआत की गई।

हरिनारायण का मानना है कि भारतीय बीमा उद्योग को प्राकृतिक आपदाओं के मामले में उचित बीमा कवर मुहैया कराना चाहिए।साथ ही, रि-इंश्योरेंस को भी मजबूत बनाए जाने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि इरडा ने प्राकृतिक आपदाओं के लिए बीमा कवर को लेकर नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के पास एक एप्रोच पेपर भी जमा किया है।

हरिनारायण ने कहा कि ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर पर्याप्त काम किए जाने की जरूरत है। इनमें से एक है प्राकृतिक आपदा या गंभीर संकट के मामलों में उचित बीमा कवर मुहैया कराना। इस बारे में हाल ही में एप्रोच पेपर पूरा किया गया है और इसे नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के पास भी भेजा गया है।

इस मामले को आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। दूसरे, एक और क्षेत्र रि-इंश्योरेंस का है और इन उत्पादों को और मजबूत बनाए जाने की जरूरत है।

यूनाइटेड नेशंस एन्वॉयरमेंट प्रोग्राम के दि इंडिया रिस्क सर्वे-2012 व फिक्की के आंकड़ों का हवाला देते हुए हरिनारायण ने बताया कि प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली मौतों की संख्या के मामले में चीन पहले, भारत दूसरे व बांग्लादेश तीसरे स्थान पर है।

वर्ष 2011 के दौरान चीन में प्राकृतिक आपदाओं की कुल 22 घटनाएं हुईं, जबकि भारत में यह संख्या 16 पर रही। हरिनारायण का मानना है कि प्राकृतिक आपदाओं के लिए बीमा और रि-इंश्योरेंस दोनों ही एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक आपदा वाले बीमा के मामले में विशेष रूप से एक अच्छी रि-इंश्योरेंस व्यवस्था होनी बहुत जरूरी है।
 

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भारत की बीमा कंपनियों के प्रबंधन के अधीन परिसंपत्तियां अगले पांच साल में 70 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 30 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच जाएंगी।

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