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Peter Drucker
मुनाफा किसी कंपनी के लिए उसी तरह है जैसे एक व्यक्ति के लिए ऑक्सीजन।

हेल्थ इंश्योरेंस को सस्ते में बनाएं ज्यादा फायदेमंद

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली | Jul 16, 2013, 00:03AM IST
हेल्थ इंश्योरेंस को सस्ते में बनाएं ज्यादा फायदेमंद

किन बातों का रखें ध्यान
बीमा कंपनी के कम से कम पिछले पांच सालों के प्रीमियम पैटर्न पर निगाह डालें। इससे आपको यह पता चल जाएगा कि कंपनी किस अवधि में प्रीमियम बढ़ाती है
कंपनी के क्लेम सैटलमेंट पर भी नजर डालिए और देखिए कि बीमा कंपनी खुद क्लेम सैटल करती है या कि इसे थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर के जरिए करवाती है
पॉलिसी में को-पेमेंट देखिए क्योंकि इससे आपको प्रीमियम में कमी करने में मदद मिलेगी क्योंकि आप क्लेम की दशा में लागत भी तो शेयर कर रहे हैं
नेटवर्क अस्पतालों के साथ ओपीडी, डायग्नोस्टिक टेस्ट पर छूट भी परख लें।

टॉप-अप पॉलिसी का उठाएं लाभ
नई पॉलिसी लेने के मुकाबले इनका प्रीमियम 30 प्रतिशत तक कम होता है
नियोक्ता की तरफ से मिले अपर्याप्त हेल्थ कवर या व्यक्तिगत हेल्थ कवर को को टॉप- अप पॉलिसी के जरिए बढ़ाया जा सकता है
टॉप-अप पॉलिसी हॉस्पिटलाइजेशन के दौरान होने वाले बड़े खर्च को कवर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
इन पर आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत आयकर में मिलती है छूट

जब आप अपने और अपने परिवार के लिए हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने का फैसला करते हैं तो इसका मतलब है कि आप उस वित्तीय बोझ से अच्छी तरह से वाकिफ हैं जो किसी बीमारी या अस्वस्थता की स्थिति में अचानक सामने आ जाता है। यही कारण है कि आज हम कुछ मूलभूत बातें बताएंगे जिनके आधार पर आप हेल्थ इंश्योरेंस का चयन कर सकते हैं।

आपको हेल्थ इंश्योरेंस जल्द से जल्द लेना चाहिए यह इसका पहला नियम है। दरअसल जब आपकी कम उम्र होती है तो ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज जैसी प्री-एग्जिस्टिंग बीमारियां  होने की संभावना कम रहती है और आपको पॉलिसी आसानी से मिल जाती है।

इसके अलावा कम उम्र में पॉलिसी लेने का एक फायदा यह भी होता है कि उसका प्रीमियम भी कम होता है। जबकि जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाती है वैसे-वैसे आपके हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम भी बढ़ता जाता है। उदाहरण के तौर पर 25 साल की उम्र में 2 लाख रुपये के कवर की प्रीमियम सालाना लगभग 2,338 रुपये होगा जबकि 30 साल की उम्र में समान कवर का प्रीमियम आपको सालाना 3,283 रुपये चुकाना होगा।

हर साल बढ़ाएं सम एश्योर्ड
पॉलिसी लेने के बाद किसी अप्रत्याशित हॉस्पिटलाइजेशन की स्थिति में वित्तीय परेशानी से निपटने के लिए जरूरी रहेगा कि आप अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का सम एश्योर्ड हर साल 10-15 फीसदी बढ़ाते जाएं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेडिकल खर्च की दर में हर साल इजाफा हो रहा है। इसलिए, इसी अनुपात में आपको  हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का सम एश्योर्ड भी बढ़ाना चाहिए।

उदाहरण के तौर पर आज कार्डियक ट्रीटमेंट चार लाख रुपये से सात लाख रुपये के बीच पड़ेगा इसमें 15-20 फीसदी की महंगाई दर जोडऩे का मतलब है कि अगले साल इसके खर्च में 60,000 रुपये से 1.40 रुपये तक की बढ़ोतरी हो जाएगी। इसी बढ़ोतरी को कवर करने के लिए सम एश्योर्ड भी उसी अनुपात से बढ़ाना जरूरी है।

ग्रुप इंश्योरेंस के बावजूद लें व्यक्तिगत कवर
ज्यादातर कामकाजी लोग नियोक्ता की एक ग्रुप हेल्थ पॉलिसी के तहत रहते हैं। हालांकि आप इस ग्रुप कवर पर पूरी तरह से निर्भर न रहें क्योंकि आपके नियोक्ता की इस मेडिक्लेम पॉलिसी का घाटा यह है कि न तो यह सम एश्योर्ड के मामले में पर्याप्त हो सकता है

और न ही लांग टर्म के लिहाज से उपयुक्त है क्योंकि ये सुविधाएं तभी तक लागू रहती हैं जब तक कि आप नौकरी करते हैं। कर्मचारी के पद और ग्रेड के अनुसार नियोक्ता की तरफ से कराए गए स्वास्थ्य बीमा की राशि आम तौर पर एक लाख रुपये से लेकर 4-5 लाख रुपये तक की होती है।

किस व्यक्ति को कब कौन सी बीमारी हो जाए यह कहना मुश्किल है, और सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल में इलाज कराने की लागत तो भुक्तभोगी बेहतर समझ सकते हैं। नौकरी छोडऩे के बाद यह सुविधाएं चली जाती हैं। इसलिए बेहतर रहेगा कि अगर आपके पास नियोक्ता का ग्रुप इंश्योरेंस है, इसके बावजूद एक अतिरिक्त कवर का होना जरूरी है जो आपको लगातार सुरक्षा देता रहेगा।

टॉप-अप हेल्थ कवर की जरूरत
टॉप-अप हेल्थ इंश्योरेंस कवर वास्तव में मेडिकल रीइंबर्समेंट कवर है जिसकी डिडक्टिबल राशि अधिक होती है। सामान्य शब्दों में कहें तो तो टॉप-अप कवर मेडिकल खर्च की निश्चित सीमा के बाद काम करना शुरू करता है।

उदाहरण के तौर पर मान लीजिए आपकी कंपनी अगर आपको तीन लाख रुपये का हेल्थ कवर उपलब्ध करा रही है तो इसके ऊपर होने वाले मेडिकल खर्च के लिए आप टॉप-अप इंश्योरेंस कवर का सहारा ले सकते हैं। तीन लाख रुपये के डिडक्टिबल  के साथ आप चाहें तो 10 लाख रुपये का टॉप-अप कवर ले सकते हैं।

अब मान लीजिए किसी कारणवश हॉस्पिटलाइज होना पड़ा और कुल खर्च पांच लाख रुपये का आया। ऐसी परिस्थिति में तीन लाख रुपये का भुगतान नियोक्ता की तरफ से मिले हेल्थ कवर से किया जाएगा और शेष दो लाख रुपये का भुगतान टॉप-अप पॉलिसी करेगी। अगर टॉप-अप इंश्योरेंस कवर लेने वाले व्यक्ति के पास पहले से कोई हेल्थ पॉलिसी नहीं है तो डिडक्टिबल जितना खर्च उसे खुद ही वहन करना पड़ेगा।

टॉप-अप पॉलिसी है सस्ती
टॉप-अप पॉलिसी अतिरिक्त स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदने के मुकाबले 30 प्रतिशत से अधिक सस्ती होती है। अगर कोई व्यक्ति अपने स्वास्थ्य बीमा का कवर बढ़ाना चाहता है तो नई पॉलिसी लेने के बजाए टॉप-अप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेना ज्यादा सस्ता विकल्प है जबकि फायदे में कोई कमी नहीं होती।

कंपनी और पॉलिसीधारक दोनों को लाभ
टॉप-अप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी बीमा कंपनियों के लिए भी फायदे का सौदा है क्योंकि बेस कवर की सीमा समाप्त होने के बाद ही टॉप इंश्योरेंस पॉलिसी प्रभावी होता है। दूसरी तरफ यह पॉलिसीधारकों के लिए भी बेहतर है क्योंकि अतिरिक्त कवर के लिए उन्हें अपेक्षाकृत कम प्रीमियम देना होता है। किसी अस्पताल में इलाज के दौरान पॉलिसीधारक को टॉप-अप हेल्थ इंश्योरेंस की सीमा तक के खर्च की चिंता करने की जरूरत नहीं होती है।

टॉप-अप और सुपर टॉप पॉलिसी में फर्क
टॉप-अप और सुपर टॉप पॉलिसी में फर्क है। दोनों के लाभों में भी फर्क है। टॉप-अप पॉलिसी के मामले में पॉलिसीधारक जितनी बार अस्पताल में भर्ती होता है गणना में कटौती की राशि (बेस कवर) उतनी बार शामिल की जाती है। सुपर टॉप-अप प्लान के मामले में बेस कवर की राशि पॉलिसी अवधि में केवल एक बार लागू होती है।

इसे एक उदाहरण के जरिए बेहतर समझा जा सकता है। मान लीजिए, अगर किसी व्यक्ति का 3 लाख रुपये का बेस कवर है और उसे इलाज के लिए साल में दो बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है जिसमें उसके क्रमश: 4 लाख रुपये और पांच लाख रुपये खर्च होते हैं।

टॉप-अप पॉलिसी ऐसे मामले में क्रमश: 1 लाख और 2 लाख रुपये का भुगतान करेगी। लेकिन सुपर टॉप-अप पॉलिसी के मामले में यह राशि एक लाख रुपये और 5 लाख रुपये होगी क्योंकि बेस कवर की कटौती पॉलिसी वर्ष में केवल एक बार होती है।

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