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केंद्र से बेहतर है छत्तीसगढ़ का खाद्य सुरक्षा कानून

सचिन चतुर्वेदी रायपुर | Jul 15, 2013, 10:18AM IST
केंद्र से बेहतर है छत्तीसगढ़ का खाद्य सुरक्षा कानून

छत्तीसगढ़ लागू कर चुका है देश का पहला खाद्य सुरक्षा कानून

फूड मॉडल
राज्य के कानून को खाद्य सुरक्षा के मामले में नया मॉडल माना गया है। छत्तीसगढ़ के कानून और केन्द्र के अध्यादेश में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक लाकर विधानसभा में पक्ष-विपक्ष के बीच व्यापक विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से यह कानून बनाया है, जबकि केन्द्र सरकार ने वर्तमान में खाद्य सुरक्षा को अध्यादेश के रूप में लागू करने का निर्णय लिया है।

केंद्र और राज्य सरकारों के बीच गरीब परिवारों को दो वक्त का भोजन देने की होड़ शुरू हो चुकी है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लागू हो गया है। छत्तीसगढ़ सरकार के खाद्य सुरक्षा कानून की बात करें तो समय के मामले में छत्तीसगढ़ पहले ही बाजी मार चुका है। राज्य विधानसभा में 21 दिसंबर 2012 को विधेयक लाकर कानून पारित कर चुकी है।

वहीं कई प्रावधानों में छत्तीसगढ़ केंद्र के कानून से बेहतर दिखाई दे रहा है। हालांकि इसका फायदा किस प्रकार जनता को मिलेगा, इसका रोडमैप तैयार किया जाना है। लेकिन दोनों कानूनों में से जो कानून बेहतर तरीके से क्रियान्वित किया जाएगा वहीं कानून छत्तीसगढ़ में आगामी नवंबर में होने जा रहे चुनावों में जीत-हार का निर्णायक बिंदु साबित हो सकता है।

केंद्र के कानून से आगे निकलने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इसके क्रियान्वयन की तैयारियां शुरू कर दी हैं। राज्य सरकार की ओर से करीब ३५ लाख से अधिक नए राशन कार्ड जारी किए गए हैं। साथ ही चुनावों से पहले अधिक से अधिक लोगों को इसका फायदा पहुंचाने के लिए क्रियान्वयन में भी तेजी ला दी है।

राज्य के खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत प्रदेश के लगभग 50 लाख परिवारों को शामिल किया गया है जो कुल आबादी के 90 प्रतिशत है। इनमें 42 लाख गरीब और 8 लाख सामान्य परिवार शामिल हैं। केवल आर्थिक रूप से सशक्त और आयकरदाता लगभग छह लाख परिवार इस कानून के दायरे से बाहर रखे गए हैं। वहीं केन्द्र सरकार के अध्यादेश में देश की 67 प्रतिशत आबादी को शामिल किया गया है।

वहीं केंद्र के कानून में प्रति व्यक्ति हर महीने सिर्फ पांच किलो अनाज की पात्रता दी गई है, जबकि छत्तीसगढ़ में एक रुपये और दो रुपये किलो में हर महीने 35 किलो चावल, दो किलो निशुल्क नमक, अनुसूचित क्षेत्रों में पांच रुपये किलो में दो किलो चना और गैर अनुसूचित क्षेत्रों में दस रुपये प्रति किलो की दर से दो किलो दाल देने की व्यवस्था की गई है।

अधिकारियों ने यह भी बताया कि छत्तीसगढ़ के कानून में खाद्य सुरक्षा देने के साथ-साथ गरीबो को कुपोषण से बचाने की दृष्टि से निशुल्क दो किलो आयोडिन नमक (छत्तीसगढ़ अमृत नमक) और प्रोटीन के रूप में चना तथा दाल देने की व्यवस्था है, जबकि केन्द्र के अध्यादेश में केवल अनाज देने का प्रावधान किया गया है।

छत्तीसगढ़ के खाद्य सुरक्षा कानून में राज्य के छात्रावासों और आश्रम शालाओं के विद्यार्थियों को रियायती दर पर अनाज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है, जबकि केन्द्र के अध्यादेश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

छत्तीसगढ़ के खाद्य सुरक्षा कानून में जिन 42 लाख प्राथमिकता वाले गरीब परिवारों को लिया गया है, उनमें छह लाख भूमिहीन मजदूर परिवार, 30 लाख लघु और सीमांत किसान, लगभग दो लाख असंगठित क्षेत्र के श्रमिक परिवार और चार लाख निर्माण श्रमिक परिवार शामिल हैं। केन्द्र के खाद्य सुरक्षा अध्यादेश में ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं किया गया है।

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के अनुसार जनता को भूख और कुपोषण से मुक्ति दिलाकर संयुक्त राष्ट्र संघ के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (मिलेनियम डेवलपमेंट गोल) को प्राप्त करना भी छत्तीसगढ़ के खाद्य सुरक्षा कानून का एक प्रमुख उद्देश्य है।

सुप्रीम कोर्ट और योजना आयोग सहित देश के अधिकांश राज्यों ने छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की प्रशंसा की है। कई राज्यों के मंत्री और अधिकारी अध्ययन दौरे पर आकर छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देख चुके हैं और उन सबने इसे खाद्य सुरक्षा के मामले में एक नए मॉडल की तरह माना है।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के कानून और केन्द्र के अध्यादेश में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक लाकर विधानसभा में पक्ष-विपक्ष के बीच व्यापक विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से यह कानून बनाया है, जबकि केन्द्र सरकार ने वर्तमान में खाद्य सुरक्षा को अध्यादेश के रूप में लागू करने का निर्णय लिया है।

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केंद्र और राज्य सरकारों के बीच गरीब परिवारों को दो वक्त का भोजन देने की होड़ शुरू हो चुकी है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लागू हो गया है।

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